सफ़र

जिंदगी के हर पल में
हर पल के हर शरण में
कभी हार तो कभी जीत में
सफ़र हैं ज़िन्दगी का सफ़र हैं

बचपन से जवानी में
संघर्ष की कहानियों में
मंजिल की ओर रवांई में
सफऱ हैं ज़िन्दगी का सफ़र हैं

अपने सपनों को दफ़ना कर
जिम्मेदारी का बोझ उठा कर
भटकता हैं संसार के हर कोने में
सफ़र हैं जिंदगी का सफ़र हैं

पर मंजिल भी हैं ज़िद्दी बड़ी
हासिल नही होती आसानी से
अपने क़दमो की गति बढ़ा कर
चलता हैं मुसाफ़िर जिंदगी के सफ़र में

कब ये अँधेरी रात ढ़लेगी
कब मंज़िल का सवेरा होगा
उम्मीद लगा कर ख़ुद से मुसाफ़िर
चलता हैं ज़िन्दगी के सफ़र में

गाँव ,गाँव से शहर
पराए तो कही अपनों के बीच
चेहरे पर मुस्कार लेकर मुसाफ़िर
चलता हैं जिंदगी के सफऱ में

कैलाश भारती

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