तुम और  देश

तुमको जहेन में उतारना दिल्ली की जहरीली हवा जैसा है, तुमको समझ पाना संसद में हंगामे जैसा है, तुमसे कुछ बोलना चाहता हूँ तो एन डी टी वी की याद आ जाती है, तुमको सुनना चाहता हूँ ,तो गुरुग्राम के जाम के हॉर्न सुनाई देते है,

तुमसे मिलना भी मोदी जी का नवाज़ शरीफ से मिलने जैसा है, तुमसे कुछ मांगना भी तो नेताओं के वोट जैसा है, तुम्हारी बोतल से पानी पीना बुंदेलखंड की याद दिलाता है, तुम्हारे साथ डिनर , कूड़े के ढेर से रोटी ढूढ़ते बच्चे की याद दिलाता है,

तुम्हारा हाथ मिलाना आगरा शिखर वार्ता जैसा है, तुम्हारा मुस्कुराना भी कुछ कुछ अमेरिका जैसे है, तुम्हारा दिल में प्रवेश चीनी सेना की याद दिलाता है , तुम्हारा बालों को सवांरना झाड़ू की याद दिलाता है,

तुम्हारा विश्वास भरा स्पर्श रूस की मित्रता जैसा है, तुम्हारे आँखों से आंसू  छलकना राज्यों के जल विवाद जैसा है, तुम्हारा बातें छुपाना काले धन की याद दिलाता है, तुम्हारी यादों को इकट्ठा करना चाहूँ तो नोटबन्दी की याद आ जाती है….

— अनुभव बाजपेयी ‘चश्म’

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