मज़ाक

मज़ाक

यूं तो हल्का-फुल्का मज़ाक माहौल को ख़ुशनुमा बना देता है। कभी दिल पर चोट भी करता है, दुनिया देखने का एक नया नज़रिया भी देता है। लेकिन अगर यही मज़ाक इन्सान की पहचान पर सवालिया निशान खड़ा कर दे, तब?

माधोगंज के गुलफ़ाम के लिए उस्ताद फ़क़ीर-उर-रहमान की कपड़ा रंगने की दुकान ही उसकी एक ऐसी दुनिया थी जिसका बेसमेंट बेशुमार रंगों से पटा पड़ा था। ये वो रंग थे जो किसी के चेहरे की मुस्कान बनकर खिलते हैं तो किसी घर में चूल्हा जलवाते हैं। उन्ही में से एक गुलफ़ाम भी था।

वह एक ठिठुरता हुआ दिन था। जिसमें कुछ इक्का-दुक्का लोग ही ज़मीन पर उतर उन बादलों के बीच चहलकदमी करते नज़र आ रहे थे। ज्यों ही गुलफ़ाम की नज़र एक तिरस्कृत ज़रूरतमंद पर पड़ी; तो वह अपने हिस्से का खाना और बरसों की धूल समेटे एक कम्बल उसे दे आया। इस घटनाक्रम की सूचना जैसे ही गुलफ़ाम के साथी कामगारों को मिली, उन्होंने एक घटिया मज़ाक बुना। जिस कम्बल की सुध अभी तक किसी को न थी, उसकी ख़ोज-ख़बर का ढोंग रचा गया। नतीजतन गुलफ़ाम डर के मारे पसीना-पसीना हो गया। उस्ताद के प्रकोप से बचने के लिए उसे चार दुकानें दूर एक बोरों से लदे ट्रक में, मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाने तक छिपे रहने की सलाह दे दी। इन्तज़ार की घड़ियाँ कुछ अधिक ही बढ़ गयीं और वह साथी कामगारों की राह देखता-देखता सो गया।

जब आँख खुली तो सामने एक नयी दुनिया से मुख़ातिब था। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, ट्रक का पहिया थम गया। दो लोग दौड़ते हुए आये और कंपकंपाती रात में उसे बीच जंगल में छोड़कर चले गये। उसने लाखों मिन्नतें की, हर आने-जाने वाले से मदद की गुहार लगाता ही रह गया लेकिन सुनने की फ़ुर्सत किसके पास थी?

“ड्राईवर अंकल! शायद सामने खड़े उस आदमी को हेल्प चाहिए?”- गाड़ी का शीशा नीचे करते हुए अन्दर बैठी उस लड़की (शनाया) ने कहा।

“लेकिन बिटिया! अगर यह कोई चोर, जेल से भागा कैदी या आतंकवादी हुआ तो??”- ड्राईवर ने आपत्ति जताते हुए कहा।

सभी गुज़रती गाड़ियों की तरह गुलफ़ाम ने इस गाड़ी को भी रोकने का प्रयास किया और सफल भी रहा।

ड्राईवर ने गुलफ़ाम से पूछा- “भाई! कुछ परेशान लग रहे हो। क्या बात है?”

गुलफ़ाम ने ठण्ड से लड़खड़ाती ज़ुबान में अपनी आपबीती कह सुनायी। शनाया को उसका चेहरा कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। इसीलिए तरस खाकर वह कहती है-“बैठिये, हम आपको माधोगंज छोड़ देंगे।”

ड्राईवर ने पुनः आपत्ति जताते हुए कहा-“बिटिया! इतनी रात गये, एक अजनबी को साथ ले जाना ठीक नहीं होगा।”

यह सुन गुलफ़ाम कुछ पीछे हट गया। शनाया ने उसे रोकते हुए कहा-
“यह अजनबी नहीं हैं। अपने माधोगंज में रहमान की जो रंगाई की दुकान है न मैंने इन्हें वहीं काम करते देखा है। क्या नाम बताया था आपने अपना..गुल…”

“जी..गुलफ़ाम”

“हाँ गुलफ़ाम भईया! इनसे तो मैंने अपने असाइनमेंट के लिए भी कुछ दुपट्टे रंगवाये थे। आप निश्चिन्त होकर बैठ जाइये।”

गुलफ़ाम शनाया का आभार व्यक्त करते हुए ड्राईवर के साथ वाली सीट पर दुबककर बैठ जाता है। वह अभी कुछ दूर ही पहुँचे होंगे कि एक पुलिस वैन ने उनका रास्ता रोका और वैन से उतरकर एक पुलिसवाले ने गाड़ी के शीशे पर डंडा बजाते हुए पूछा-“कहाँ जा रहे हैं आप लोग?”

“माधोगंज जा रहे हैं साहब!”-ड्राईवर ने गाड़ी के कागज़ात दिखाते हुए सभी की पहचान बतलायी। कुछ जाँच-पड़ताल और पूछताछ करने के बाद उन्हें जाने की अनुमति दे दी गयी।

सफ़र एक बार फिर शुरू हो गया जो अगला चेकपोस्ट आते ही थम गया। पूछताछ का सिलसिला पुनः आरम्भ हुआ किन्तु इस बार शक की बुनियाद पर उन सभी को गिरफ़्तार कर लिया गया। कानून के पहरेदारों के पास हर विरोध का एक ही उत्तर था- “चुपचाप पुलिस चौकी चलिए, वहाँ आपको सब पता चल जायेगा।”

सभी माधोगंज आ पहुँचे मगर पुलिस वैन में, जहाँ पहले से ही उनके परिजन मौजूद थे।

“यह क्या बात हुई इंस्पेक्टर साहब, आप मेरी बेटी को यहाँ क्यों लाये हैं?”- शनाया के पिता ने गुस्से में कहा।

“देखिये मिस्टर! आपकी बेटी ने एक आतंकवादी की मदद की है।”

सभी चौंक जाते हैं। जिस पर इंस्पेक्टर साहब एक स्केच पेश करते हुए बतलाते हैं कि 4 दिन पहले उक्त हुलिये वाले एक दहशतगर्द ने नेपाल बॉर्डर से भारत में घुसपैठ की है। इसीलिए उनके महकमें के लोग शक के आधार पर तलाशी ले रहे हैं और लोगों को गिरफ़्तार कर रहे हैं।

“लेकिन दरोगाजी! मेरे बेटे ने क्या किया है?”-गुलफ़ाम के पिता ने सवाल किया।

“अगर इस आतंकवादी के चेहरे पर दाढ़ी लगा दी जाये तो ये ऐसा दिखता है।”-इंस्पेक्टर ने गुलफ़ाम की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

जिस पर गुलफ़ाम और उसके पिता ने आपत्ति जताते हुए उसकी बेगुनाही और पहचान के ढेरों सबूत और गवाह पेश कर दिये। मगर सभी को दरकिनार कर और गुलफ़ाम को दोषी ठहराते हुए, कानून के रखवाले उसे जेल भेजने की तैयारियों में जुट गये और उधर पैसों के बल पर शनाया का नाम मामले से रफा-दफा कर दिया गया।

बेगुनाह गुलफ़ाम को बलि का बकरा बनते देख, शनाया की अंतरात्मा उसे झकझोर रही थी लेकिन वह फिर भी बेबस बनी इन्साफ का गला घोंटे जाते देखती रह गयी। सिर्फ़ इस डर से कि कहीं उसके खानदान या उसका नाम न ख़राब हो जाये।

वह बस इतना कर पायी कि लौटते समय रुंधे गले के साथ, गुलफ़ाम के पिता को केवल सांत्वना के कुछ शब्द और कोर्ट जाने की सलाह दे गयी।

कुछ बारह साल बाद गुलफाम छूट गया क्योंकि न्याय की सुरक्षा के एक स्तम्भ की कार्यसिद्धि की कलई कुछ वकीलों और न्यायाधीशों की पैनी नज़रों ने खोल दी थी।

मगर न्याय व्यवस्था का यह कैसा मज़ाक था कि गुलफ़ाम की ज़िन्दगी के 12 साल जो उसने किसी और के गुनाहों का बोझ ढोते-ढोते स्पेशल सेल में काटे, उसके पिता जो कानूनी गिरहें खोलने की खातिर फंदा-दर-फंदा अपने बेटे के बेगुनाही के सबूत लिए झूलते रहे, उसका परिवार जो एक दहशतगर्द के रिश्तेदार होने की जिल्लत के साथ, इस तथाकथित समाज में नज़रें उठाकर चलने के काबिल भी न रह गया था। आज न्यायाधीशों ने लम्बे अरसे तक चले वज़ूद के इस संघर्ष को तीन शब्दों में समेट दिया-“वी आर सॉरी”।

जिस ज़मीन पर वह गद्दार घोषित कर दिया गया था, आज जब गुलफ़ाम के पैर दोबारा उस ही मिट्टी पर पड़े तो मिट्टी की वह सौंधी महक उसके जेहन में बीती यादें ताज़ा कर गयी। इन्साफ के लिए झूलते हुए उस तराज़ू की आँच में वह अपनी पहचान तो खो ही चुका था और अब तो माधोगंज भी वैसा न रह गया था।

छोटी-छोटी दुकानों की जगह बड़े-बड़े मॉल और शोरूम ने ले ली थी। बिजली की तारों का बोझ झेलते खम्भे, आज शान से खड़े सोलर पैनल की छत बनाये एल ई डी और सी एफ एल से सड़कों को रोशन कर रहे थे। गुलफ़ाम के उस्ताद फ़कीर-उर-रहमान की रंगाई की दुकान की जगह भी एक जाने-माने बुटीक ने ले ले थी। गुलफ़ाम का यह नए और पुराने का फ़र्क अभी मुक्कमल भी नहीं हुआ था कि एक गाड़ी अपनी रफ़्तार की अकड़ में उसे लहुलुहान कर गयी।

भीड़ को चीरते हुए एक लड़की(शनाया), घायल गुलफ़ाम की तरफ़ दौड़ते हुए आगे बढ़ी -“हटिये-हटिये! किसी की हेल्प करने की बजाय भेड़-बकरियों की तरह झुण्ड बनाकर खड़े हो जाते हैं।”

ज्यों ही वह अस्पताल ले जाने के लिए बेदम होते गुलफ़ाम को पलटती है, उसकी नम आँखें और लड़खड़ाती ज़ुबान पुकारती उठती है-“गुल..गुलफ़ाम…..”।

शनाया गुलफाम की रिहाई से खुश थी मगर उसका सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी। इसलिए वह गुलफ़ाम के दुरुस्त होने से पहले ही वहाँ से चली गयी। उसकी आँखों से छलछलाते आँसू दिखावे की चादर में घुटते विश्वास की गवाही दे रहे थे।

— ऋचा इन्दु 

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This Post Has One Comment

  1. Very heart touching story!!! Congratulations!!

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