इंसान

इंसान

इसानियत है मर चुकी इंसान कहाँ है
भारत की पहले जैसी पहचान कहाँ है ।

अपने ही बुजुर्गो को कर रहे है दर- बदर
श्रवण कुमार जैसी वो संतान कहाँ है ।

सीमा पे मर रहे जो भारत के वास्ते
उन वीर शहीदो का भी सम्मान कहेँ है।

भारत विरोधी नारे लगाते जो आजकल
गैरत से जी रहे है स्वाभिमान कहाँ है ।

कई लोग जल रहे है मुफलिसी की आग मे
किस्मत हर किसी पे मैहरवान कहाँ है।

हिन्दू ओ मुसलमान भी हँस कर मिले गले
ऐसी दीवाली ,ईद ,वो रमजान कहाँ है ।

रावण के जैसे नैता यहाँ घूम रहे है
कलयुग मे ले अवतार वो भगवान कहा है।

“नीरज”वही गरीबी ,भूख, गंदी बस्तियाँ
मोदी का स्वच्छ हिन्द अभियान कहाँ है।।

— पवन शर्मा “नीरज”

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