बैरिन भई रातें

बैरिन भई रातें

बिन पिया बैरिन भई सब रातें
किसे बुलाऊँ सौतन भई सब बातें
हेर – हेर देखत कब आये प्राण प्यारा
बिन उसके हाड़ माँस सूख भए खाँचे

पिया गया परदेश न भेद काहूँ को दूँ
सखिन मेरी सब प्रिय के  रंग – राती
कोऊँ ठौर न आवे बस मन मेरो दग्धावे
जे भँवरो रोज बैठ कर  नियरे सुलगावै

प्रिय के बिन राति ये  कल्प सी लागे
उर उरोज में तेरो प्रेम शूल कुटिल उगावे
यह तन सुलग सुलग कर कागा सा लागे
कागा तो अच्छो कोयल के हिय लागे

पूस माघ की ये रातें जी को ठन्डावे
गति मेरे जिय की ऐसी ज्यों सापिन डरावे
धक -धक करता ज्यों इंजन सा जावे
प्रिय बिन बैरिन भये मेरो हिय गात

— डॉ मधु त्रिवेदी

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This Post Has One Comment

  1. सुंदर रचना । साधुवाद

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