एक संस्मरण

 

आज कलम लेकर यूँही बैठी थी , टेबल पर माँ और पिताजी की तस्वीर देख ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो बचपन लौट आया हो ।

स्मृतियाँ मानो दौड़ी चली आयीं । बचपन भी कितना लुभावना होता है न । कभी न भूल पाने वाले पल कितनी सहज कर रखें जाते है जैसे कोई अपना खिलौना सहज कर रखता है । जैसे जैसे बड़े होते जातें है बचपन किनारा  कर लेता है ।

 

पिताजी सुबह साढ़े पांच  बजे की लोकल पकड़कर बोरीवली जाते थे । माँ और मैं घर में रहते थे । माँ तड़के ही उठकर पानी भरने बिल्डिंग में नीचे गेराज में जाती थी । जहाँ हम रहते थे ,पानी ऊपर नहीं आता था । दो मजला नीचे से पानी लाना पड़ता था । माँ कहती है मैंने उनसे कहा था कि मैं भी पानी भरुंगी सो मेरे लिये एक छोटी सी बाल्टी लायी गयी थी ।

मैं शायद तीन या चार साल की रही होऊँगी । उस दौरान मेरे पिताजी की मौसी जो की नेत्रहीन थी , और काफी बुज़ुर्ग थी वे आई हुई थी । दक्षिण में एक रिवाज़ है की जो महिला उम्र में बड़ी हों रसोई वे ही बनाती है । नानी विधवा थी । वे भी तारों की छाओं में नहा धोकर अपना खाना खुद बनाती । खुद के कपड़े अलग से सुखाती । बेहद प्यार कर ने वाली महिला थीं । उनके हाथ से बना खाना मुझे कभी तो पसंद आ जाता कभी मैं मना कर देती थी । कभी वे नमक डालना भूल जाती । हाँ इतना याद आता है वे मुझे बिठाकर कहती ,”तिन्नवे तल्ली “(खाले बिटिया)। मैं खूब शरारती थी ,उनको खूब चिढ़ाती थी । वे बेचारी कुछ न बोलती ।

पड़ोस में मेरे एक मामा रहते थे , उनसे खून का रिश्ता न सही पर एक अटूट रिश्ता है । उनके दो बेटे और एक बेटी थे । बड़े भैया का नाम जीतू ,फिर शैलेश और बहन वर्षा। हमारे घर में फ्रिज नहीं था । पापा को मैं नायना बुलाती थी । नायना मेरे लिये मक्खन लेकर आते थे जो मामा के फ्रिज में रख देते थे ।

होता यूँ था की जीतू भैया हमारे घर पर खाना खाते और मैं उनके । यह तकरीबन होता ही था । एक बार माँ रसोई में कुछ काम कर रही थी और मैं सीढ़ियों से नीचे उतर गयी । जीतू भैया ने देख लिया और वे मेरे पीछे पीछे आये । उन्होंने मुझसे पूछा ,” कहाँ जा रही हो ?” मैंने कहा ,” भैया मुझे आइस क्रीम खानी है ।” अब भैया के पास भी पैसे तो थे नहीं पर वे मुझे गोद में उठाकर ले गये । करीब ही एक शादी का हॉल था , वहां हम दोनो आइस क्रीम खा रहे थे । अब घर से हम दोनों गायब थे सो ढूंढा ढूंढी शुरू हो गयी । इस बीच किसीने घर आकर बता दिया था कि हम कहाँ हैं  । घर आने के बाद डाँट भी पड़ी  ।

हाँ ,एक और किस्सा याद आता है । मुम्बई में 1969 में टी वी आ गयी थी । हमारे पास एक छोटी सी टी वी थी ।

एक बार बारिश के मौसम में तेज़ बिजली चमकी सो शायद उसका सर्किट में कोई प्रॉब्लम हो गयी  । उसके बाद होता यह था की उसके पीछे टेबिल फेन चलानी पड़ती थी ।

जीतू भैया , आज भी उतना ही प्यार करते हैं । उन्होंने बड़े बेटे होने का फ़र्ज़ पूरा किया । जब पिछले साल 20 जून को पिताजी की अंतिम यात्रा थी । भैया ने अपना कांधा दिया । कभी नहीं भूल सकती अपनों का प्यार ।

 

— कल्पना भट्ट

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