शराब-ए-मोहब्बत

हर मयख़ानें में भटका हूँ
कोई चढती नहीं शराब
आँखों से पिलाई है तुने
उतरती नहीं शराब।

ना बहकी-बहकी बातें
है तन की ताल नशीली
मन में है चढी ख़ुमारी
कोई देती नहीं ज़वाब।

आँखों से पिलाई……….

नहीं दिखते दो-दो चार
कुछ-कुछ होता है यार
मस्ती की लहर चली है
कुछ करती नहीं ख़राब।

आँखों से पिलाई………….

बिकती नहीं बाज़ारो में
मिलती नहीं मयख़ानों में
मन के मांगे मिल जाती
नहीं करती कोई क़रार।

आँखों से पिलाई………

मन झूमे है तन झूमे
झूमे है ये ज़ग सारा
रुह में रुह समा गई है
कोई पङती नहीं दरार।

आँखों से पिलाई है तुने
उतरती नहीं शराब।
—  के.वाणिका ‘दीप’

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