बेटी

बेटी या संसार को, है जीवन आधार
बिन बेटी के सून है ,घर आँगन परिवार

घर आँगन परिवार, लगे सब खाली खाली
देवी को अवतार,वो दुर्गा लक्षमी काली

त्याग प्रेम की है मूरत,अरु ममत्व की पेटी
माँ, भगिनी कभी भार्या,ये जगत की बेटी ।

(2)
बिटिया निज माँ बाप से,करती यही गुहार
मत बेटे की चाह मे, मोय गरभ मे मार

मोय गरभ में मार,न कर तू ये महापाप
बेटी है वरदान, याकू न समझ अभिशाप

सुख दुख सब हँस के सहे,करती बात मिठिया
त्याग प्रेम और समर्पण,ये सिखाए बिटिया ।।

–पवन शर्मा “नीरज”

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