जीवन में प्राकृतिक एवं कृत्रिम झंझावातों को झेलते हुए कई बार हम दोराहे पर होते हैं,हमारे सामने दो मार्ग होते हैं-कंटक पूर्ण एवं निष्कंटक। दोनो हमें आमंत्रित करते हैं,आत्मा को किसी पर विश्वास नहीं हो पाता-क्या करूँ, किधर जाऊँ?

बिल्कुल स्वाभाविक है कि ऐसी विषम परिस्थिति में हम निष्कंटक मार्ग को ही अपना जीवन साथी मान बैठते हैंऔर कालक्रम में अफ़सोस भी करते हैं।कंटक से पूर्ण मार्ग हमें परिस्थितियों से संघर्ष करनें की क्षमता प्रदान करते हैं जो हमारे लिए वरदान प्रमाणित होता है।हमारे द्वारा चुने गये निष्कंटक मार्ग हमें कामचोर,आलसी और पुरुषार्थविहीन बना देते हैं।

संघर्ष!संघर्ष ही तो जीवन है।जिसे हर पल तूफानों ने पाला हो,तूफानो के बीच ही जिसनें एक-एक पल बिताया हो,जो तूफानों के साये में ही पल्लवित,पुष्पित हुआ हो उसे संघर्षों से क्या डरना!

जो चढ़ता है,वही गिरता है।जो अपने कदम बिना किसी सहारे के आगे बढ़ाता है,उसके मन में पीछे छूटने का भय तो अवश्य होता है पर वो कभी पीछे नहीं छूटता-बस बढ़ता ही जाता है,बढ़ता ही जाता है,अनवरत,अहर्निश……।जो चढ़ा ही नहीं वह गिरेगा कहाँ?चोटी चूमनें की हिम्मत करनेवाले साहस के पुतलों को सदा ही रुकावटों,टेढ़े-मेढ़े पगडंडियों से होकर अपनें धैर्य की बैसाखी थामें चलते ही रहना पड़ता है,कितनें ही प्राकृतिक एवं कृत्रिम खूँखार मौकों का सामना भी करना पड़ता है।आगे बढ़ने की बातें होते ही रुकावटें सज-सँवर कर साथ-साथ चलने को तैयार हो जाती हैं पर उनके सामनें समर्पण कर देना हिम्मतवालों का काम नहीं।

परिश्रम और अनवरत परिश्रम का पाथेय अपनें साथ लेकर चलनेंवाला सदा ही आगे बढ़ता चला जाता है,परिस्थितियाँ उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती,हारकर उसे समर्पण करना ही पड़ता है।संघर्ष बहादुर लोगों को एक नवीन साँचे में ढालकर एक सुंदर स्वरुप प्रदान करता है,इसमें कोई दो मत नहीं।किसी नें इसी विचार को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए लिखा है–

“वह पथ क्या,पथिक-कुशलता क्या

जिस पथ में बिखरे शूल न हों

नाविक की धैर्य कुशलता क्या

यदि धाराएँ प्रतिकूल न हों!”

–अनिल कुमार मिश्र

Rating: 1.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...