नज़्म- कहने दीजिए

बह रहा दरिया तो बहने दीजिए।
रेत की दीवार है ढहने दीजिए।।
आसमाँ से है इजाजत मिल गई।
इन जमीं वालों को रहने दीजिए।।
मयकशी का शौक है यूं ही नहीं।
सह नहीं पाते यूं सहने दीजिए।।
बेख़ुदी में शायरा बेख़ौफ़ है अब।
कह रही है आज कहने दीजिए।।
शिमला आज़मी

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