में दशरथ मांझी जी को सास्टांग दंडवत करता हूँ

विडम्बना देखें कि यही सरकारी अमलों के थोथी बाते कर खुद का पीठ खुद से थपथपाने वाले भीरु, लोग चित्र साझा कर लिखते हैं

“ में दशरथ मांझी जी को सास्टांग दंडवत करता हूँ l”

 

 

हैं न कमाल की बात, दंडवत के पीछे भी, अपनी दरियादिली के ढोंग का ही उद्देश्य है अन्यथा विचार करते कि आप सब तब कहाँ थे जब दशरथ मांझी खून पसीना बहा कर सम्पूर्ण जीवन पथ्थर तोड़ने में पिघला रहे थे, जो कि सरकारी नुमाईंदों का ही कर्तव्य था l तो ऐसा भी नहीं की हालत बदल गए हैं,आज भी बहुत सी मजबूरी माझी के नाम से दिख ही जाती है पर आप आदर्शवाद के झूठे ढोंग में जियें ये गफलत की जिंदगी मुझे मंजूर नहीं, मेरा उन सभी अश्रुद्योतको को,जो कि मृत माझी के द्वार पर खुदगर्जी का शीश नवाने गये थे उन्हें यह सन्देश ,बेहिचक कवि धर्म निभाते हुए खरा , …

 

दशरथ मांझी को नमन करता एक साधारण सा कलम पुजारी

 

इस दुस्तंत्र के,भयाह्वः,चट्टान के सामान अहंकार, को खंड-विखंडित कर देने वाला था वो माझी,

 

इस विभद्दस,  कुरूप, कुलीनतंत्र को आईना दिखला देने वाला था वो माझी,

 

इस अचेत, निर्मम स्वाभिमान को परिश्रम के शौर्य से ध्वस्त कर देने वाला था वो  माझी, पद,महान,गौरव-गाथा झूठी-शान को पावों तले रौंद देने वाला था वो माझी,

 

हौसला,शाहस,फौलाद सा अडिग,उदयमान,बलशाली,

 

इन शब्दों को एक और मुकाम देंने वाला था वो माझी,

 

आदर्शवाद,और झूठे दर्शन-शास्त्र, की झूठी उड़ान को रेंगते हुए छोड़ जाने वाला था वो मांझी,

 

एक साधारण सा दिखने वाला,हर किसान में बसने वाला एक जन-सामान्य ही था वो “दशरथ मांझी”

 

लोक-प्रशासन, कल्याणकारी-राज्य की झूठी राजनीति को

 

चुनौती देने वाला था वो माझी,

नतमस्तक,सास्टांग-दंडवत का ढोंग तुम न करो ,

प्रह्लाद से ध्रुव बन तुम्हें इस योग्य भी कहां छोड़ने वाला था वो माझी,

मृदुल चन्द्र श्रीवास्तव 

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