कुकर में पकती सियासत

लकड़ी बीन कर चूल्हा जलाना बन्द करो भई। दिल्ली वाली सरकार ने एलपीजी देने को कहा है। पर ऐसे नही!!! पहले चूल्हे पे चढ़े तावे पर एक वोट सेंक के दो। बस कुछ ही दिन बाद ये धुआं-धक्कड़ पुरानी बात हो जायगी।फूंक फूंक कर ताप बनाए रखना, रोटी के लिए कंडी सुलगाए रखना..ये प्राचीन हो जायेगा। अब तो पतीले में चमचा डाल कर बैठने का भी जमाना जायेगा।एक कदम बढ़कर सूबे ने कुकर से किचन की खेती करने को जो कहा है। मतलब अब सियासत में सामजिक संघर्ष नही बचा है। कस्मकश तो सत्ता के लिए है।सरसराती लौ पर सीटी मारो और गरमा गरम परोस दो।

नेता जी के पीछे खड़ा काले चश्मे वाला बॉडीगार्ड कितना हंस रहा होगा। नित नए तम्बू में मङ्गलाचरण।फिर माइक पर स्वादिष्ठ सहानुभूति बटोरने में लगे हैं। दवा दाल दारू घी दही की बातें फिर फुर्र… राम रहीम को ठेकेदारी और जनता को जज्बात सौंप देते हैं।लोकतंत्र की लंका में बयार बह जाती है। चुनाव आयोग फायर बीग्रेड की तरह मुस्तैद रहता है।सियासत की बदबू में खोये चम्मच रौंदे सौंदे पड़े है। भत्ता की चाहत जो न कराए।लौंडों को रोजगार से ज्यादा भत्ता वाली सरकार चाहिए।चम्मच ( दलाली की ट्रेटिंग किए, चमचा के अधीन) सांठ-गांठ में बड़ी रूचि रखते हैं। मुहल्ले का पिछला चुनाव हार के आए चम्मचगण जी,यस,बिल्कुल,हां,एकदम में ठीक-ठाक कमाई कर लेते हैं। आलम ये है कि सोशल मीडिया पर दिन रात गालियां खाने-पीने वाला बन्दा प्रचार मैनेज कर रहा है।ऐसा लगता है फेसबुक न होता तो चुनाव सेलेब्रेट ही न होता। पत्रकार भी फेसबुक लाइव पर टहल रहे हैं।कई लिहाज से ये चुनाव उतना मजेदार नही है जितना यूपी को वो साथ पसन्द है। देखना होगा कमल की कलाकारी, बिगड़ैल साइकिल की सवारी,हाथ या हाथी।
–सुधांशु श्रीवास्तव

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