फुटपाथ पर बिछौना

फुटपाथ पर बिछौना

थके मादें जम्हाई लेकर
लुढक पड़े उल्टा सीधा
यार का पांव तकिया,और
बाजू वाला खर्राटा भरता
यमराज अलर्ट रहता
किस वक़त यहां से वहां,
शिफ्ट होना पड़े।
हो सकता है सुबह हो ही न,
ठीक वैसे
जैसे रामदीन को सुलह होना पड़ा
मौत के साथ।
देखो कितना उजाला है हमारे
ऊपर,
हाईवोल्टेज स्ट्रीट लाइट
फिर दिखा क्यों नही उसका देह,
रौंद कर रख दिया।
सच कहूं!! सपने फुटपाथ पर भी
आते हैं! हाँ सच में मैंने देखा है
पुलिस को डंडा करते हुए।
शक रहता है किसी की
बपौती पर तो नही पसरा हूं।
खैर रात की ही तो बात है,
दिन तो पैडल पर जोर लगाते बीतता है।
बगल में टायरों का रगड़न,
साहबों के मोटरगाड़ी की
सायरन, से थोडा मन खट्टा
रहता है। फिर भी पड़ा रहता हूं
औंधे मुंह।
चिंता सुबह होने की नही,
होती है रात कटने की।
पता नही रात भर की धूल
सुबह झाड़ पाऊंगा।
गुजरते एक साब से
‘आजादी’ सा कुछ सुना था।
जिक्र “सत्तर साल” का भी कर
रहे थे।
लेकिन मैं तो अभी चालीस का
भी नही हूं।
जरूर कुछ और बक रहे होंगे,
अरे मुझे कुछ नही चाहिए।
देना है तो सिर्फ सलामती दे दो।
काले शीशों से थोड़ा देख लो।
अभी मैं फुटपाथ पर ही हूं…
– सुधांशु श्रीवास्तव

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