राष्ट्रवाद

एक जहर-सा
भर रहा है खून में
हो रहा हूँ आदमी से जानवर
कह दिया मुझसे गया है कान में
बन रहे हैं लोग सारे जानवर, देखता हूँ
गजब उन्माद है।
भीड़ का यह तंत्र
कैसा लोकतंत्र ?
उन्मादियों का तंत्र
ऐसा लोकतंत्र ! सोचता हूँ
देश की यह एकता
एक लय में गा रही
गीत लेकिन यह वही उन्माद है
करता रहा खण्डित हमारी प्रीति को
सभ्यता, संस्कृति और प्रीति की हर रीति को
क्या इसे स्वीकार कर नतमस्तक हो लें या
कहें इस भीड़ से
ठहरो जरा
उन्माद हर लेता है वह सद्भावना
श्रेष्ठ जिस कारण हुई मानवता
हम करेंगे कत्ल किसको ?
अपने ही भाई-बंधुओं
और
हम देखेंगे फिर भी स्वप्न
विश्व-गुरु भारत भला ऐसे बनेगा ?
बुद्ध से गांधी का कोई मेल
विश्व-गुरु बनना नहीं है खेल
भावना जब होगी सब की एक
“वसुधैव कुटुम्बकम” संदेश !
छोड़ दो उन्मादियों उन्माद
भटकाव है यह
नहीं है “राष्ट्रवाद।”
-डॉ. कविता नन्दन

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