गधा उदास है

पढ़ लिखकर गदहे ने डिग्री बहुत कमाई , पर उसके बदले उसने नहीं नौकरी पाई।
सोचा अबकी लडू इलेक्शन, बन जाऊं मैं मुखिया
वोट तो सबकी ले ही लूंगा, रमई हो या सुखिया
किस्मत उसकी अच्छी थी की, जीत गया वो भइया
खाने को अब मिलता हरी नोटों वाली घास है, पर पता नहीं क्यों ऐसा है कि गदहा अभी  उदास है।
पीठ पर ढोता था जो लादी, जनता सिंहासन बैठा दी
धूप में था जो दौड़ा जाता , ए०सी० में वह समय बिताता
धोबी की जो लाठी खाता , आज वही लाठी बरसाता
चिल्लाकर कहता कि राजा मैं रिमिक्स हूं, पांच साल के लिए फिक्स हूं
पानी नहीं है पीता कहता विस्की ब्रांडी में मिठास है,पर पता नहीं क्यों ऐसा है कि गदहा अभी  उदास है।
जीत कर उसने हर विभाग में भर्ती खूब निकाली
बेकारों के पैसे से जेबें अपनी भर डाली
शिक्षा विभाग में भी उसने रिक्ति पर मुहर लगा दी
बेबुद्धि के विज्ञापन पर कोर्ट ने रोक लगा दी
अब वो भर्ती करने का करता नहीं प्रयास है, पर पता नहीं क्यों ऐसा है कि गदहा अभी  उदास है।
कभी उछले कभी कूदे कभी वो लात से मारे
पैतृक भूमि में जा गा रहा कजरारे कजरारे
कोई पूछे न आता डांस लेकिन कर दिया ऐसा
हमारे जेब खाली हैं और उसके पास है पैसा
इतना लूट लिया जनता को कि लूटे क्या बदमाश है,पर पता नहीं क्यों ऐसा है कि गदहा अभी  उदास है।
कोर्ट कचहरी कुछ न मानें अपनी करनी को ही ठानें
यज्ञ करायें बुद्धि शुद्धि लोग कहें की दें सद्बुद्धि
लोगो से वो कहता फिरता गर है ठीक से रहना
वोट दुबारा मुझको देना जय गदहे की कहना
एहसास करे एहसास लोग लेते अब लम्बी सांस है पर पता नहीं क्यों ऐसा है कि गदहा अभी  उदास है।

– अजय एहसास

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