बस रस्म भर बचा ,दिल लगाना अब तो

बस रस्म भर बचा ,दिल लगाना अब तो
किताबों के किस्से ,टूटके चाहना अब तो

प्यार और वफादारी चलन में नहीं लगते है
लोग कम रखते , कीमती खज़ाना अब तो

दिन ब दिन बेगाना हुआ जाता है शहर भी
अपनों की भीड़ ,हर चेहरा अनजाना अब तो

जबसे सूखा है शज़र मौसम की बेरूखी से
रूठी बहारें ,पंछी ने बदला ठिकाना अब तो

ज़रा सी ठेस से दरक जाता है शीशा दिल का
नाजुक प्यार हुआ,पत्थर लगे जम़ाना अब तो

–श्वेता

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