ज़रा सुनिये नेता जी !

भारत देश दुनिया का क बड़ा लोकतान्त्रिक देश है ,परंतु आजकल यह लोकतंत्र दुनिया के लिए जोकतंत्र बनता जा रहा है .लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव होता है चुनाव  ! कहा जाता है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यदि कुछ है तो वह है चुनाव …आजकल देश में चुनावी माहौल देखकर जी में आया कि आप सब के साथ अपने कुछ विचार साझा करूँ . आप कृपा कर यह पहले ही जान लें कि मैं यह सब एक आम नागरिक की हैसियत से लिख रही हूँ . किसी पार्टी विशेष से न तो मेरा कोई नाता है न किसी पर विशेष प्रेम.न ही मैं किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष  की समर्थक हूँ, न आलोचक और न ही भविष्य में कभी राजनीति के दलदल में प्रवेश करने की कोई मंशा है मेरी .तो आप भी उतने ही तटस्थ भाव से लेख पढ़ें जितने तटस्थ भाव से मैंने लिखा है .

इन दिनों जहाँ -तहाँ मजमा लगा कर हमारे तथाकथित महान नेता मदारी की तरह तमाशा दिखा कर तालियां बटोरते दिख जाते हैं.कोई किसी गधे को अपना हथियार बनाता है तो कोई गधे की तारीफ कर के तीरंदाज़ी करता है. वार पर वार ,वार पर पलटवार ! वाह- वाह ! क्या भाषा है ! क्या अंदाज़ ! लोगों को यह तक याद नहीं रहता कि हम जो कुछ कह रहे हैं यह देश की सर्वोच्च शक्ति के विषय में कह रहे हैं ..अरे भाई व्यक्ति की न सही पद की गरिमा को तो समझें .और पद की गरिमा को निभाना  पदासीन व्यक्ति की भी उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी होती है .कुछ कहें अनुशासन और विनम्रता ताक पर रख देते हैं लोग. न कोई बोलने वाला बोलने से पहले कुछ सोचता है न सुनने वाला जवाब देने से पहले .हमारी सभ्यता संस्कृति की कसमे खाते हैं दुनिया भर के लोग ! सभ्यता की लुटिया डूबती देख बड़ा ही कष्ट होता है पर क्या करें मन मसोस कर रह जाते हैं .

बेचारी जनता राजनेताओं के हाथ का खिलौना बन चुकी है , जिसे देखो वही हमारे जज़्बात  से खिलवाड़ करने में लगा हुआ है . भाषणों के दौर में कुछ  गरीब लोगों को पैसे के बल पर इकठ्ठा कर के  भीड़ जुटा ली जाती है और कुछ पिट्ठू होते हैं जिन्हें तालियां बजने के लिए लाया जाता है .यह काम भी चमचों कि फ़ौज से आसानी से करवाया जाता है .

भीड़ जुटाने का मकसद होता है एक तरह का शक्ति प्रदर्शन ताकि देखने वालों को बेवकूफ बनाया जा सके कि देखिये फलां पार्टी की लहर है लहर ! अपना वोट सार्थक करना हो तो इन्ही को वोट देना वर्ना वोट बेकार …!!.

अब भाषण में नेता जी जब तक विरोधी पार्टियों की बखियां  न उधेड़ें तब तक भाषण भाषण ही नहीं होता .इन दिनों बड़ा मनोरंजन हो रहा है अपना . बेचारी जनता को नेता जी हिन्दू मुसलमान के चक्कर में उलझा   देते हैं और मज़े से राम रहीम के नाम पर अपनी रोटियां सेंकते हैं आम दिनों में चाहे हिन्दू नेता इफ्तार की पार्टी में मौज उड़ाएं या मुसलमान होली दीवाली मनाएं . फोटो खिंचवाने और न्यूज़ में बने रहने को भी तो कुछ चाहिए न हुज़ूर ! फिर अपने को सेक्युलर भी तो बताना है …यह सब हथकंडे तो अपनाने ही पड़ेंगे .

 

किसी भी देश की उन्नति के लिए उसकी युवा पीढ़ी का जागरूक होना ,शिक्षित होना पहली शर्त है .और युवा पीढ़ी का सही दिशा में  चलना अति आवश्यक है किन्तु इन दिनों यूनिवर्सिटी में उठे बवाल को देख कर लग रहा है कि नेताओं कि नयी जमात का प्रशिक्षण केंद्र बनते जा रहे हैं हमारे विश्वविद्यालय .चुनावी माहौल है तो यहाँ भी दलगत राजनीती ज़ोर पकड़ती दिख रही है .पढाई के स्थान पर लाठी डंडों की भाषा बोल रहे हैं हमारे देश के भावी कर्णधार . भाषणबाज़ी, आरोप- प्रत्यारोप  और वर्चस्व की लड़ाई चलती ही रहती है. युवा पीढ़ी का भी इस्तेमाल करने में कहीं चूक नहीं होती और हैं, सो चाहते हैं कि इस नयी जमात का इस्तेमाल भरपूर करें इसके लिए  यूनिवर्सिटीज को और उनके युवा नेताओं की खेती  को खूब काटते न ….इन्ही की उगाई हुई फसल है जी, काटेंगे भी तो यही !

समझ में नहीं आता है कि जब एक संस्था को सुचारू रूप से चलने के लिए नियम कायदे बनाये जाते हैं तो फिर देश को चलने के लिए क्यों नहीं ? हमने यह कभी कहीं नहीं देखा कि किसी संस्थान की कोई एक शाखा ठीक से कार्य न करने पर जवाबदार न हो .एक भी अधिकारी यदि ठीक से अपना कार्य नहीं करता तो उसे अपने उच्च अधिकारी को जवाब देना पड़ता है वर्ना एक दो बार चेतावनी देने पर भी कार्य ठीक से न होने कि स्थिति में उसे सजा दी जाती है या काम से हटा दिया जाता है .ऐसा देश के मामले में क्यों नहीं हो सकता ?

यदि केंद्र सरकार किसी योजना के लिए धनराशि राज्य सरकारों को देती है तो क्यों नहीं समय पर कार्य न करने पर साथ के साथ जवाब लिया जाता ? क्यों छोड़ दिया जाता है इन बातों को इलेक्शन में मुद्दा बनाए रखने के लिए ? अजी यदि ऐसा हो जायेगा तो बेचारे चुनावी भाषणो में क्या कहेंगे ….कैसे एक दूसरे को नीच दिखाएंगे !

भला देश तरक्की कहाँ कर रहा है ? देश के हर राज्य में तो कमियां ही कमियां हैं जिन्हें भाषणों में सुनाया जाता है  है और उस पर तुर्रा यह कि देश खुशहाली की ओर बढ़ रहा है , तरक्की कर रहा है  …

तुलसीदास जी ने कहा है  कि-

 ‘मुखिया मुख सो चाहिए , खान पान को एक |

 पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक || ‘

फिर देश  का कोई हिस्सा अविकसित या अल्पविकसित रहे ही क्यों  ! राजा क्यों न समय रहते सुध ले अपनी प्रजा की ?

चुनाव में देश का कितना धन लगता है, समय की हानि होती है. क्यों थोपा जाता है चुनाव हम पर जब उसका कोई औचित्य ही नहीं . जैसे कोई दो पार्टियां जीतने के बाद जोड़ तोड़ की सरकार आपसी सहमति से बनाती हैं वैसे ही हर पांच साल बाद आपसी सहमति से  बारी -बारी से  मलाई खाने की नीति ही बना लें .

जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की बाद में जो खरीद  फ़ोरख़्त होती है ,जोड़ -तोड़ होता है और लोकतंत्र को जोकतंत्र बनाया जाता है वह तो किसी से छुपा ही नहीं है .

मुझे लगता  है कि जब अपनी ही मर्ज़ी से जोड़ तोड़ करने की आज़ादी है इन सबको विधान के अनुसार तो फिर यह चुनाव का ढोंग और तमाशा क्यों ?

— मंजु सिंह

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