मौसम है बसंती सा   

मौसम है बसंती सा ,

हवाएं महकी -महकी सी .

रंगीं हैं नज़ारे भी ,

फ़िज़ाएं चहकी- चहकी सी .

पड़ी हैं आम पर बौरें भी –

आँगन में सुनहरी सी,

हवा की मंद लहरें हैं ,

लगे मंडराने  भौंरे भी .

नए पत्ते , नयी खुशबू

नयी हर बात लगती है .

वो देखो नन्ही अमिया भी

ले रही हैं हिलोरें सी .

आ रहा बांध के रंगों की पगड़ी

फाग देखो जी,

पड़ीं  होली की बौछारें

हुई धरती रंगीली सी .

गुलमोहर  के तले बिछ आयी

देखो सुर्ख चादर सी ,

ये कैसी रुत बहारों की

घुली हर ओर मिसरी सी !

 — मंजू सिंह

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