सियासत की निगाहें

सुबह से शाम तक बिजली सड़क पानी की आहें हैं,

हमारे वोट पर पूरी सियासत की निगाहें हैं।

न जाने कितने सालों से यहां वीरानीयत सी थी,

अभी कुछ ही महीनों से विधायक की निगाहें हैं।

कभी जो कार से आकर शकल भी न दिखाते थे,

उन्हीं के प्लेन से अब उड़ रही शीतल हवाएं हैं।

वो दादी जिनके घर में  शाम को चूल्हा न जलता था,

उन्हीं के घर पे कल से धन कुबेरों की निगाहें हैं।

सियासत की निगाहें खून जिनमें खौलता सा था,

अभी उनकी निगाहें वृद्ध भिक्षुक की निगाहें हैं।

सियासत की निगाहों से कभी बारिश नहीं होती,

अभी उनकी  निगाहें , कलाकारों की निगाहें हैं।

— अनुभव बाजपेयी”चश्म”

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu