खामियां

ऐ ज़िन्दगी तेरी खामियों को

दूर करना चाहता हूँ।

जो नहीं दिया मुकद्दर ने

मै उसे पाना चाहता हूँ।

माना कई दफ़ा हारा हूँ।

एक दफ़ा तुम्हे हराना चाहता हूँ।

ऐ ज़िन्दगी तेरी खामियों को

तुझसे दूर करना चाहता हूँ।

ज़माने ने तोड़े है।मेरे शीशे के घर

मै उन्हें जबाब देना चाहता हूँ।

उनकी बनाई इस ख्यालात

की दुनिया का खाब्ब तोड़ना चाहता हूँ।

ऐ ज़िन्दगी मै तेरी खामियों को

दूर करना चाहता हूँ।

— अविनाश कुमार

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