चीचो

“चीचो आ गयी” “चीचो आ गयी” घ र से दफ्तर के लिये निकल रहा था कि तभी यह आवाज़ सुनायी पड़ी । मेरी माता जी अपनी नातिन को खिला रहीं थी । मेरीपुत्री जो कि अभी सिर्फ 6 महीने की है यह आवाज़ सुनकर एकदम चुप होकर इधर उधर देखने लगती है, मानो कि चीचो का इंतजार कर रही हो,उसी तरह जिस प्रकार मानव अधूरी इच्छाओं का इंतजार करता है। मन तो हुआ कि कहूँ कि अब  चीचो नहीं आती, पर बिना कुछ कहे ही चुपचाप दफ्तर के लिए निकल आया । पर यह आवाज़मस्तिष्क से निकल नहीं  पा रही थी ।

मुझे अपना बचपन याद हो आया जब गाँव में दादा जी मिट्टी के बरतन में पानी और अनाज के दाने रखते थे एवम पूरा आँगन चहचाहट से भर जाता था । आँगन से लगी हुई तीन दरवाजो वाली तिदोरिया में कम से कम चार या पाँच घोंसले हमेशा मिल जाते । माँ कहती कि गौरैया के बच्चों को छूना नहीं वरना गौरैया ही अपने बच्चों को मार डालेगी, बड़ा अजीब लगता  सच कहूँ तो उस उम्र में डर भी लगता । समानांतर रूप से एक घर में पाँच या छः परिवार पलते रहतेl उनसे हमारा एक भावनात्मक जुड़ाव सा हो जाता । तभी दफ्तरी ने आकर सूचना दी कि बड़े साहब याद कर रहे हैं ।  मैंने यादों के पिटारे को,जिसने आज सुबह से झकझोर रखा था ,एक ओर रखा और साहब के केबिन की तरफ़ चलाl साहब का आदेश था कि
शहर के दक्षिणी सिरे पर जो एक सौ हेक्टयर में फैला हुआ जंगली इलाका है वहाँ का निरीक्षण कर के रिपोर्ट करो सरकारी आदेश केअनुसार वहाँ शहरी बस्ती बसाई जायेगी । मैं अपने स्थान पर आकर बैठ गया,यह कोई पहली दफा नहीं था जबकि इस प्रकार का आदेश मुझे प्राप्त हुआ था, पर आज की बात कुछ और थी।  पिटारा खुला हुआ था और पिटारे से नयी नयी यादें निकल कर सामने आ रही थी ।

लल्लू याद आ गया मुझे ,लल्लू एक गौरैया का बच्चा था जो कि तिदोरिया की  एक धन्नी से नीचे आ गिरा था । नीचे लल्लू सीधा मेरे बिस्तर पर ही गिरा था । शाम तक मैं माँ के साथ रूई के फाये से लल्लू को दूध पिलाता रहा, शाम को लल्लू के प्राण पखेरू उड़ गये l माँ ने लल्लू के मरते ही उसको आँगन में ही गढ्हा खोद कर गाढ़ दिया जिस से कि मैं लल्लू की याद भूल जाऊँ पर इसके बाद भी मैंने पूरे एक दिन तक खाना नहीं खाया था । अब तो जब पूरा जंगल काटा जायेगा तो जाने कितने लल्लू मरेंगे,जाने कितने परिवार तबाह होंगे । यह  जीव हमारे साथ रहते रहते हमारे परिवार का हिस्सा बन जाते हैं । इनसे हम मानसिक रुप से जुड़ जाते हैं,यह  हमको प्रेम करना सिखाते हैं,साथ रहना सिखाते हैं ,दया करना सिखाते हैं और एक शाइस्तगी से भरा स्वभाव हमको दे जाते हैं ।  शाम को घर आ कर भी अजीब सी उपापोह से मन भरा हुआ था ।  माँ
के शब्द “चीचो आ गयी ” अभी भी दिमाग में गूँज रहे थे ।

रात भर सो नहीं पाया पर अगली सुबह होने तक मैं निर्णय ले चुका था,जिसके फलस्वरूप मेरा इस्तीफा मेरी जेब में था । नौकरी तो छोड़ दी पर समस्या अभी भी ज्यों की त्यों खड़ी हुई थी । पता चला कि शहर में एक सज्जन हैं जो कि पहले से ही गौरैया नामक एक संस्था चला रहे हैं जिसका कि उद्देश्य गौरैया का बचाव एवम सम्बर्धन करना था। मैं कपूर जी से मिला अपनी समस्या उनके सामने रखी । कपूर जी और मैं दोनो ही लोगों ने रात दिन एक कर दिया अब तो मानो मेरे जीवन का उद्देश्य ही था कि कैसे भी जंगल को बचाना है ।

काफ़ी भागदौड़ के बाद आज  मेरे पूर्व बड़े साहब का फोन आया कि “मिश्रा जी आप जीत गये । अब जंगल काट कर शहरी बस्ती बसाने का प्लान सरकार ने केंसिल कर दिया है । अब उस स्थान पर एक पार्क बनाया जायेगा और एक भी पेड़ को काटा नहीं जायेगा ।
बड़े साहब ने निश्चित किया था कि पार्क का उदघाटन मैं और कपूर साहब करेंगे । मेरी आँखो से आँसू आ गये,सहसा मेरी यादों की गठरी फ़िर से  खुल गयी । देखता हूँ कि लल्लू अचानक से जी उठा है और अपने छोटे छोटे पंखों की सहायता से उड़ते हुए मेरे सिर के चारो तरफ़ चक्कर काट रहा है मानो धन्यवाद ज्ञापित कर रहा हो l

–अंकुर मिश्रा

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