कागज की आँखें

लगता है दिवारों पर टंगी आँखों को देखकर
कइंर् युग चल रहे हैं एक साथ
ऐसा जान पडता है मैं ही विरोधी हूँ
इन बीते युगों का
सामने देखता हूँ दीवार पर एक कैलंडर
देवता समुद्र मंथन में लगे हैं
मैं चोरी से अमृतपान कर
देवता बन बैठा हूँ झूठ कपट का
छल रहा हूँ जीव जगत को
ये कैसा कलयुग का सतयुग है।
अपनी दाईं तरफ देखा एक चित्र
राम खड़ा है अडिग समुद्र के उस पार
शायद मेरी खोज में
मैं भी युद्ध को आतुर
खड़ा हूँ दस मुखौटे लिए
ताकि लड़ सकूं छल से
कलयुग के त्रेता में।
अपनी बाईं तरफ देखा मुड़कर
रथ पर सवार एक सारथी
दे रहा उपदेश पार्थ को
कर्मण्येव अधिकारस्तेः का
कर रहा है उंगली मेरी तरफ
मैं भी लड़ने को तैयार
डटकर खड़ा हूँ कौरव शिखर-सा
खुद के कमरे में कुरूक्षेत्र सा माहौल बनाए
लड़ने फिर एक बार
कलयुग के द्वापर में।
पीछे मुड़कर देखा एक कागज पर
नन्हे बच्चों का चित्र
जो फूल फेंक रहे हैं मुझ पर
एक हारे हुए से योद्धा पर
मैं भी सोचता रहा इस चित्र को देखकर
काश! देखा होता पीछे मुड़कर एक बार
बचा लेता खुद को इस कलयुग में
इन कागज़ की नजरों से भी गिरने।

–लव कुमार

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