ये जो दिन है, ना

ये जो दिन है, ना
विरोध में है मेरे
मुझे पता है …इतने जल्दी नही जायेंगे
मेरे यथार्थ चक्षु से…मगर करना क्या है अब
रुकना है या फिर चलना
अगर रुकता हूँ.. तो कइयों का विश्वास टूट जायेगा
और चलता हूँ ..तो कई लोगों के  विरोधो का शिकार हो जाऊंगा
हमेशा में कहता हूँ ,
“एक रास्ता कई रास्तो से होकर गुजरता है”
हा! गुजरा तो है ,एक बार नही बल्कि बार-बार गुज़र रहा हूँ
उसी रास्ते से एक चाह को साथ लिए ..
लेकिन में कल्पनाओ में नही जीना चाहता।…हर कोई अजमाकर चले जाता है, विश्वास तोडकर
मेरे सामने खुश होने की प्रतिक्रिया को तोड़ते हुये.. में भी तो अपूर्ण सपने देखने लगता हूँ..
कोई भी साथ नही ….बस दिखावा लग रहा है।

किसी से कोई उम्मीद नही..कोई अपनाये या नही
में समझ गया हूँ…. ये सब मतलब का खेल है।

श०अमलवासी

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