बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख दो

मौन मन में बात कुछ आती नहीं

बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख दो

 

मौन बेला ना खलेगी जिंदगी की

प्रगति के शिखर पर कदम  यूं बढ़ते रहेंगे

कड़वी दवा सा सर्द भी मीठा लगेगा

बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख दो

 

जिंदगी आसान सी हो जाएगी

गम के बादल झट यूं ही  छंट जाएंगे

सांस लेना सीख लूंगा मैं और हां वो धड़कने भी

बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख  दो

 

दुख के बढ़ते मित्र सब जाने लगे

बेवजह बस यूं ही समझाने लगे

मन समझना चाहता कुछ भी नहीं

बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख दो

 

मन मन को बात कुछ भाती नहीं

बस तुम मेरे हाथों में अपना हाथ रख दो

— अनिल कुमार मिश्र

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