गाँव को भूला चला 

शहर की चकाचौंध में
मैं भी कितना खो गया
रंग भरते – भरते जीवन में
बेरंग कितना हो गया

टुटी छप्पर चुते पानी
खिलखिलाहट की मस्ती सारी
ताल तलैया बाग बगिचा
झोड चला मैं मोहक की गलीया

बचपन की यादे सब
समेट लिया एक कोने में
गाँव झोड मैं जा रहा हूँ
शहर में मैं आज खोने

भूल बिसर कर गाँव की पगडण्डी
झोड मौज मस्ती की बस्ती
दादा दादी की कहानी को
गाँव भुलाकर जा रहा हूँ

 –  महेश गुप्ता जौनपुरी

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