यात्रा एक ऐसा अनुभव है जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक तय करके मन की संतुष्टि करता है हालाँकि यात्रा का मुख्य उद्देश्य सिर्फ अपने मस्तिष्क को शुद्ध आक्सीजन देना ताकि हमारा मस्तिष्क सुचारू रूप से सटीक और सही निर्णय कर सके

क्योंकि व्यक्ति जिस दिन से मनुष्य जन्म लिया उस दिन से उसका दिमाग क्रियाशील हो जाता है और धीरे धीरे समय गुजरते हुए दिमाग की क्रियाशीलता बढती जाती है जिससे दिमाग को आवश्यक मात्रा में भोजन अर्थात शुद्ध आक्सीजन चाहिये लेकिन समाज तथा परिवार के नकारात्मक विचार तथा व्यवहार के कारण व्यक्ति अपने मस्तिष्क को शुद्ध आक्सीजन नहीं दे पाता जिससे दिमाग सटीक निर्णय देने में असमर्थ हो जाता है ।
इन्हीं नकारात्मक विचारों को त्यागने के लिये मानव ने यात्रा को चुना । चूंकि यात्रा तो एक आवागमन की स्थिति है लेकिन इसे आवागमन के साथ साथ ये मानव के मस्तिष्क को पूर्ण रूप से स्वस्थ करने का सबसे अच्छा इलाज है जब व्यक्ति अपने उद्गम स्थान से किसी अनजान जगह के लिये प्रस्थान करता है तब उस व्यक्ति का दिमाग अपने नकारात्मक विचारों को त्यागना शुरू कर देता है क्योकि उस समय उसका मस्तिष्क सिर्फ अपने गंतव्य स्थान की ओर ध्यान देता है मतलब जैसे वह केवल अपनी मंजिल को पाना चाहता हो फिर उस अनजान जगह पहुँच कर, वहाँ के वातावरण तथा वहां के तौर तरीकों से अपने सभी नकारात्मक विचारों को त्याग देता है और अपने आप में नयापन सा प्रतीत पाता है ।
ऐसे ही अपने नाकारात्मक विचारों को सकारात्मक करने के लिये

मुझे यात्रा करने पर मजबूर होना पड़ा।
ये वाकया दिसम्बर के महीने का है जब मेरी दो प्रतियोगी परीक्षाएं लगातार होनी थी इसलिये मेरे दिमाग में कुछ ज्यादा ही उलझनें थी और दूसरी उलझन मुझे सूरत (गुजरात) से आये हुए छः महीने बीतने वाले थे क्योंकि मैं छः महीने पहले आईएएस की तैयारी करने के उद्देश्य से घर आया था ”क्योकि मेरा आईएएस परीक्षा देने का संकल्प आने वाले साल की परीक्षा देना थी“ सो मैंने सिविल सेवा की सारी पठित सामग्री एकत्रित किया और पढने में लग गया लेकिन इसी महीने दूसरी प्रतियोगी परीक्षाये भी देनी थी सो मैंने उन परीक्षाओ का रिवीजन करना शुरू किया और परीक्षा के एक दिन पहले घर से निकला मेरी पहली प्रतियोगी परीक्षा दूसरी पाली में थी इसलिये मैं बिल्कुल निश्चिंत था मेरे साथ एक दोस्त भी था हम दोनों आराम से एक घंटा पहले परीक्षा केंद्र कानपुर पहुँच गये मैं वहां का नजारा देखकर हैरान रह गया अरे इतनी भीड़ थी कि वहां बैठने के लिये जगह न थी उस भीड़ में माता, बहनें, बेटियां तथा भाई सभी लोग मौजूद थे क्योंकि ये सभी लोग शिक्षित बेरोजगार के रूप में थे इनके चेहरे पर
रोजगार की नयी आशा नजर आ रही थी यही तो बात है हमारे देश की, यदि इन सभी बेरोजगारो को रोजगार उपलब्ध हो जाये तो अपना देश बहुत जल्द तरक्क़ी करके सबसे आगे हो जाये लेकिन ऐसा संभव नहीं है। फिलहाल मैंने पेपर दिया फिर दूसरे पेपर के लिये हम लोग झांसी परीक्षा केन्द्र के लिये निकले यही हाल वहां का भी था सभी लोग अपना अपना बैग लिये तथा प्रश्नों के उत्तर रटते हुए परीक्षा समय का इंतजार कर रहे थे खैर हमें वहां प्रवेश मिल चुका था परीक्षा दिया।
परीक्षा देने के बाद मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था क्योंकि परीक्षा में सब गडबड हो गया था पहली उलझन पेपर लीक होने की तथा दूसरी उलझन पेपर ठीक से हल नहीं हो सका । अब ऐसा लग रहा था मुझे घर नहीं जाना चाहिये सो मैंने निर्णय लिया की मैं सूरत ही जाऊँ गा और वहीं काम करने के साथ अध्ययन भी करता रहूँगा क्योकि यदि हम काम धाम छोडकर पढाई में लग भी जाये परीक्षा भी अच्छे अंकों से पास भी कर ले लेकिन सिलेक्शन तो होना नहीं है क्योकि परीक्षा के पहले ही लोग लेनदेन करके सेलेक्शन ले लेते हैं इसलिये मेरा मन घर में रहकर पढाई करने से मना किया और मैं अपने अंतिम निर्णय के साथ सूरत जाने के लिये झांसी रेलवे स्टेशन पर आ गया ।
यहाँ से सूरत जाने वाली गाड़ी का समय पौने पांच बजे का था मैं जनरल टिकेट दो घंटे पहले ही ले लिया था ताकि कोई परेशानी का सामना न करना पड़े । फिर वहीं स्टेशन पर घूमता रहा जो भी कुछ नाश्त बचा था उसको खाया क्योंकि मैं किसी होटल में कुछ खा भी नहीं सकता था क्योकि मेरे पास सीमित पैसे ही बचे थे खैर दो घंटे इंतजार के बाद गाड़ी आयी बहुत भीड़ थी धक्का मुक्कों करके किसी तरह से डिब्बे के अंदर
पहुंचा वहां सभी सीटे पहले से बुक थी मैंने उन लोगों से बैठने के लिये निवेदन किया पर उन पर कोई असर नहीं पड़ा क्योकि हमारे देश में इंसानियत की रेखा बहुत कम दिखती है काफी मशक्कत के बाद ऊपर वाली सीट मिली और मैं उसमें बैठ गया फिर मुझे बहुत ही आराम मिला थोडी देर के बाद गाड़ी चलना शुरू कर दिया मैं तो आराम से ऊपर वाली सीट में लेट गया। मन मे कई विचार आ रहे थे, कि पढाई के चक्कर में छः महीने बरबाद कर दिये इन छः महीनों में करीब लाख रूपये कमा सकता था लेकिन फिर मन को शांत करने वाला विचार आया, ”अरे जिंदगी भर कमाना ही है अभी जो भी समय पढने का बचा है उसका उपयोग करो वरना ये समय निकल जाने के बाद जिंदगी भर पछताना पडेगा ऐसे सोचते सोचते पता नहीं कब नींद आ गयी क्योंकि दो दिन का थका हारा भूखा था न।
अचानक मेरी नींद खुली उस समय अंधेरा दिखाई दे रहा था मतलब रात हो गयी थी उसी समय मेरी नजर मेरी सामने वाली सीट पर बैठी एक लडकी पर पड़ी वो लोग मुंबई जा रहे थे उसके साथ उसके मां पिता और भाई थे मैं सोचने लगा कि कैसे लोग अपना तथा अपने बच्चों की परवरिश करने के लिये अपनी जन्मभूमि को छोड़ने के लिये मजबूर हो जाते है ऐसे कितने ही परिवार होंगे जो अपना घर बार छोड़कर परदेश कमाने के लिये आ जाते है यह आशा लेकर कि वहीं बच्चों की परवरिश तथा पढाई भी हो जायेगी तथा साथ ही साथ उनको रोजगार के लिये कहीं चक्कर भी नहीं लगाने पडेगे और इसीलिये आज गावों की अपेक्षा शहरों मे जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक हो गया है तथा लोग अपने गांव को भूलने लग गये हैं यदि इन्ही गाँव के लोगो को उनकी जन्म – भूमि पर ही काम मिलना लग जाये तो गाँव तथा शहर में कोई परेशानी नहीं होगी दोनों का बेलेंस बराबर हो जायेगा न शहरो में जनसंख्या घनत्व बढ़ेगा और न ही गावों में जनसंख्या घनत्व कम होगा। मैं ऐसा सोच ही रहा था कि अचानक टीटीआई मेरे डिब्बे में प्रवेश किया टिकट टिकट टिकट सभी लोग अपनी अपनी जेब से टिकट निकाल कर देने लगे उनमें से एक परिवार बिना टिकट के बैठा था टीटीआई ने उसको पकड लिया और जुर्माने के तौर पर एक टिकट का हजार रूपये माँगा वो तीन लोग थे काफी निवेदन करने बाद टीटीआई तीन सौ रूपये लेकर छोड दिया। लेकिन यहाँ मुझे भ्रष्टाचार का प्रकोप नजर आया ( टी टी आई और पैसेंजर दोनों पर), पहली बात पैसेंजर को बिना टिकट यात्रा नहीं करनी चाहिये तथा दूसरी टीटीआई को जुर्माना के तौर मिली रकम को इतना बढाकर नहीं बताना चाहिये, तभी तो हमारे देश से भ्रष्टाचार खत्म नहीँ हो रहा है भ्रष्टाचार में दोंनो पक्ष आरोपी होते हैं।
कुछ देर में मेरा स्टेशन आने वाला था मैं उतरने की तैयारी करने लगा मेरे दिमाग में जो घर में नकारात्मक विचार पैदा हुये थे धीरे धीरे करके ये सब निकल रहे थे क्योकि कमाने जो आ गया था । स्टेशन आ गया मैं गाडी से उतरकर सीधे अपने स्टैंड पर आया और सवारी गाड़ी में बैठकर करीब एक घंटे के सफर के उपरांत सही सलामत अपने रूप पहुँच गया यहाँ पहुचते ही मेरा मन घर के सभी
नकारात्मक विचारों को त्याग चुका था और अब संकल्प किया कि काम के साथ साथ ही पढाई करूंगा और कामयाबी को हासिल करूंगा यहीं मेरा अंतिम फैसला है ।ढ

ओम नारायण

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