छोड़ चला मैं

बीच भंवर में, एक समर में
अपने पथ को छोड़ चला मैं
गांव की गलियां,खिलती कलियाँ
बीती बतियाँ छोड़ चला मैं ।

आम की बगिया,दूध की नदियां
ताल-तलैया छोड़ चला मैं
बहती पुरवईया , सोन चिरईया
तपती दोपहरी छोड़ चला मैं ।

माँ की ममता,भ्रात की समता
बाप तन मन छोड़ चला मैं
खुशियों के मेले,हंसी ठिठोले
बहन पराई छोड़ चला मैं ।

दोस्तों की यारी,राधिका प्यारी
गोपियाँ सारी छोड़ चला मैं
उपजाऊ धरती गांव की मिट्टी
छोड़ चला , परदेश चला मैं ।

– राघवेश यादव ‘रवि’

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This Post Has 3 Comments

  1. Manju Singh

    atyant bhavbhari sunder prasturi !!!

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  2. राघवेश यादव रवि

    बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय

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  3. Sanjay Saroj "Raj"

    “शब्दों” का सटीक और सुन्दर चयन

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