तलाश अभी अधूरी है

बंधु मेरे ! जरा गौर से ढूंढो
क्या दिख पड़ता है तुम्हें कोई
मेरे जैसा चुपचाप डरा सा
या खुश चंचल बालक कोई
 
इस नदी के साथ साथ
वो भी आया था कुछ दूर तक
जीवन की तलाश मे
 
नदी को तुम अपना ही समझो
कहा था कुछ पत्थरो ने,
जब था वो  बीच बहाव मे ;
और कि यहाँ सदा बना रहेगा
तुम्हारे आने का एक प्रतीक।
 
वो अनाड़ी फंस गया जाने कहाँ
कि जीवन खत्म होने को है
और तलाश अभी अधूरी है ।

— सत्येंद्र कुमार

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