जिंदगी सो रही है

रिश्तों में विश्वास और देह में  श्वास – कही खो रही है
न जाने क्यों लगता है, कि जिंदगी सो रही है

चलो, उठो, नए स्वपन देखे, उन क्षणों को साकार करे
जिन क्षणों  की प्रतीक्षा में आँखे उनींदी हो रही है

कुछ तुम चलो, कुछ मैं चलू, फासले थोड़े तो कम कर ले
सफर अकेले तय करते हुए, थकान बहुत हो रही है

कभी देती थी जो चंद खुशियों की सौगाते हमें
वो धरती न जाने क्यों सुप्त बीजों को  बो रही है

कुछ हकीक़त कुछ सपने कुछ सपनो की कीमतें
जिंदगी मेरी जैसे कोई अवांछीत बोझ ढो रही है

कोशिश करो कि न रहे मन का चातक प्यासा
बंजर हो चुकी है धरती, तड़प कर  रो  रही है

— अभय

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