शायरी (व्यंग्य)

Home » शायरी (व्यंग्य)

शायरी (व्यंग्य)

कौन कहता है कि दर्पण झूठ नहीं बोलते , मैंने लाख गम छिपाये थे
फिर भी चेहरे पर हंसी दिखाया आईना।।

इंसानियत यहाँ हमने मरते देखा है , बाप घर के बाहर
और घर में कुत्ते देखा हैं।।

दुनिया जान गयी है कि उसको चोट लगा है,
क्योंकि उसे चिल्लाना आता था,
मेरे आघात को किसी ने न समझा
क्योंकि मुझे खामोशी भाँति थी।।

मेरी हर बात उसको खलती है,
फिर भी वो मेरी ही राहो मे चलती हैं।

किताब-ए-इश्क पढ़कर भूलाा दिया हमने
न किसी से शिकवा, न गीला किया हमने
पूछा जो किसी ने मेरी दास्तान-ए-मौहब्बत
एक चिराग जलाकर, बुझा दिया हमने।।

माँ का आँचल काफी था, बचपन में धूप से बचने के लिए,
अब तो ये टोपी भी कोई काम नहीं देती।।

मैं जानता हूँ नमक मिलेंगे जख्म पर मेरे
क्योंकि मुझे सच बोलने की आदत जो है।।

उंगली उठ जाती है सभी की, एक गलती पर
उसके हजारों अच्छाईयाँ नजर नहीं आती
ये कलयुग है मेरे दोस्त …
यहाँ सच्चाईयाँ नजर नहीं आती।।

कुछ चीज तुम्हें भी अच्छा लगता होगा मेरा
इसलिए अक्सर मेरे खिलाफ खड़े होते हो।।

दोस्ती हमसे सोच-समझकर करना दोस्तों,
दुश्मनी भी हम बहुत सलीके से निभाते हैं।।

— संतोष कुमार वर्मा 

Say something
Rating: 3.8/5. From 10 votes. Show votes.
Please wait...

Warning: strtolower() expects parameter 1 to be string, array given in /home/content/n3pnexwpnas03_data02/13/41944013/html/wp-content/plugins/userpro/functions/hooks-filters.php on line 57

One Comment

  1. Yunush January 28, 2018 at 12:01 pm

    Sitam pe fir sitam iizad karoge kya tum .
    Mujhe bhi pyar me barbad karoge kya tum.

    Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
    Please wait...

Leave A Comment

हिन्दी लेखक डॉट कॉम

सोशल मीडिया से जुड़ें ... 
close-link