आ जाओ गोरैया

आ जाओ गोरैया, मेरी उंगलीयों पर बैठों।

उसमे फल,फूल,पत्तीयाँ, तो तुम्हैं नही मिलेगीं।

मग़र मेरा वादा हैं,ये उंगलीयां भी।

तुझ पर,कभी नहीं उठेगीं।

प्यारी गोरैया लौट आओ,मेरे आँगन में।

वहाँ वसुधा की,विशालता तो तुम्हैं नही मिलेगी।

परन्तु प्रेम की,लघुता भी तुम्हैं नही दिखेगीं।

मैं तुम्हैं अहिंसक,भाव से पूकार रहा हूँ।

तुम्हैं बन्दी बनाने का,प्रयत्न भी नही हैं।

पिंजरा भी नही टागां,किसी तोते को बना गंगाराम।

फिर तू तो,मेरी प्यारी गोरैया हैं।

जिसकी चहचहाहट से,मैं सदा खिल उठता हूँ।

सरोवर के,शतदल की तरह।

न तो मेरे पास गूफन हैं,न ही गिलौर।

मैं तो बस लाया हूँ,जल भर सकोरा, प्यास बुझाने को तेरी।

बिखराये हैं दाने,चुगने को चहुँओर।

आ जाओ प्यारी गोरैया,आँगन में कर दो शौर।

– अखिलेश जैन

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