तेरा हृदय… 

हे  कलियुग  !
तेरे    आगमन     ने
दशा ही बदल दी  उसकी,
सहने  लगी  है  अब
हर   मौसम
बेसहारा   बन
भटकती  रहती  खुले  में
भिखारिन  सी  द्वार -द्वार
देखी  जा  सकती
भूखी -प्यासी
गली – गली , गाँव – गाँव
शहरों  की  सड़कों  पर
जो कभी  पुजती  थी ‘ मातृवत ‘
वो सुन  रही  आज  दुत्कार
सह  रही  डण्डों  की  मार
आश्चर्य  !
घोर आश्चर्य !!
भर -भर के ट्रक
भेजी जा रही  कत्लखानों में ,
कटने  के  वास्ते  अब  तो
झूठा  दम्भ  है  तेरा
गौ  भक्ति  का / कृष्ण  भक्ति का
सच  में  आज ,
कितना  निष्ठुर  हो  गया
तेरा  हृदय  !
छोड़  दिया  जिसने
द्रवित  होना  , उद्वेलित  होना …

— विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’

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