कल्पना को कल्पना ही रहने दें

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कल्पना को कल्पना ही रहने दें

स्कूल में एक कहानी पढ़ी थी –muddleheadness । कहानी ये थी की एक व्यक्ति बिलकुल  अकेला था । कोई परिवार ,रिश्तेदार ,मित्र कोई नहीं था । अकेलेपन की बोरियत दूर करने के लिए वो  एक उपाय सोचता है । रोजमर्रा की चीजों को दूसरे नामों से पुकारना शुरू करता है । जैसे कमीज़ को रुमाल कहना, चाय को रोटी कहना आदि । धीरे धीरे वो अपनी एक अलग भाषा गढ़ लेता है । उसकी vocabulary  में हर चीज़ के उलट पुलट नाम होते हैं । आगे 2 वो वाक्य भी सामान्य तरीके से अलग गढ़ना शुरू करता है । इस प्रकार वो दुनिया से अलग अपने लिए भाषा की एक नयी दुनिया बना लेता है । शुरू शुरू में उसे इस सबमें  बहुत मज़ा आने लगता है। उसका अच्छा टाइम पास होता है । कोई चीज़ बाज़ार लेने जाता है तो उसे भी अपने दिए नाम से माँगता है । दुकानदार की झुंझलाहट देख वो खूब मज़े लेता  है ।

        समय बीतता है । अपनी बनायी भाषा उसके मन -मस्तिष्क पर हावी हो चुकी है। धीरे धीरे वो  सामान्य भाषा भूलने लगता है । कोई चीज लेने जाता है तो उसका वास्तविक नाम याद करने में उसे कठिनाई आने लगती है । एक समय ऐसा आ जाता है कि वो संसार की भाषा पूरी तरह भूल चुका है। उसकी भाषा किसी को समझ नहीं आती। जिस अकेलेपन और बोरियत को दूर करने के लिए उसने ये प्रयोग किया था …..उसी भाषा ने उसे अब बिलकुल ही अकेला कर दिया है ।

      कहानी देखने में बहुत सपाट है पर उसका मनोवैज्ञानिक अर्थ बहुत गूढ़ है। ये कहानी आज के  सोशल मीडिया पर पूरी तरह लागू होती है। आज लोग अपना अकेलापन, बोरियत दूर करने फेसबुक पर आते हैं। बहुत से लोग (90%) ( ये एक सर्वे कहता है ) …फेक id के साथ यहां  लिखते, पढ़ते सन्देश  शेयर करते हैं। पुरुष महिला बन कर और महिला पुरुष बन कर  स्वयं को प्रस्तुत करते हैं । नकली नाम, नकली फोटो सब कुछ नकली का खेल चलता है। पहले ये खेल उन्हें अच्छा लगता है। आरम्भ में उन्हें इस सबमें बहुत मज़ा आता है। वास्तविक जीवन में वो जो नहीं होते उससे अलग यहाँ स्वयं को प्रस्तुत करते है। धीरे धीरे एक फेक id से ऊब जाते है दूसरी , तीसरी और भी अनेक बनाते हैं । एक समय ऐसा  आता है कि उनका निजी और वास्तविक रूप खोने लगता है। अपने द्वारा रचा गया नकली संसार ही उनका सच बन जाता है। जिस अकेलेपन और बोरियत को दूर करने वे यहां आये थे वो उनके वास्तविक जीवन  को ही खत्म कर देती है।    

       आप सबने अर्जुन का केस सुना पढ़ा होगा। एक जवान लड़का … जिसने अपनी आत्महत्या को सोशल मीडिया, फेसबुक पर लाइव प्रस्तुत  किया। ये सोशल मीडिया का भयावह सच है … अपने वास्तविक जीवन से  बोर, दुखी हो चुके लोग मात्र कुछ लाइक्स, नयेपन, वाह और थोड़े से मजे के लिए किस हद तक जा सकते हैं ? ये घटना इसका उदाहरण है। किसी चीज़ की आदत होना अच्छी बात है पर किसी चीज का नशा होना भयानक है । इससे बचें।muddelheadness के पात्र की तरह बिलकुल ही अकेले  होकर जीवन से निराश हो जाएं इससे पहले संभल जाएँ । आभासी दुनिया को खुद पर इतना हावी न करें की आपका वजूद  खतरे में पड़ जाये  और आप भीड़ में भी अकेले हो जाएं ।

— डॉ संगीता गांधी

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7 Comments

  1. hindilekhak April 23, 2017 at 10:03 pm

    बहुत ही सुन्दर रचना … यह रचना अवश्य ही सबको एक बार पढ़नी चाहिए …
    हमारे समाज/ हमारे लोगों न जाने कब एक काल्पनिक दुनिया बना लिया और उसमें खो भी गए …

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  2. डॉ संगीता गांधी मुस्कान April 23, 2017 at 10:51 pm

    हार्दिक धन्यवाद ।

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  3. Shaban khan April 24, 2017 at 11:32 am

    बहूत ही तथ्यात्मक और शोधपरक लेख है।आप ने इसमें आज के सोशल मीडिया के भयानक} सच को उजागर किया है ।

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  4. डॉ संगीता गांधी । April 24, 2017 at 9:34 pm

    हार्दिक धन्यवाद ।
    जी ,ये सोशल मीडिया का भयावह सच है ।

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  5. saurabh January 20, 2018 at 12:09 pm

    sunder……..

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  6. Sujata gorain January 21, 2018 at 2:16 pm

    Aaj k sach ko ujagar krti rachna……arthagarvit

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  7. Sanjay Saroj "Raj" April 28, 2018 at 11:10 am

    यथार्थ चित्रण !!!!

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