बचपन और नानी का घर

गर्मी की छुट्टियां आतीं और बस हम बच्चों की नानी या दादी के घर जाने की मांग ज़ोर पड़ने लगती.माँ तो चाहती ही थीं की कुछ दिन के लिए कहीं जाएँ तो वो भी चैन की सांस लें .अब गर्मी हो या सर्दी बेचारी माँ को कहाँ छुट्टी मिलती थी कभी ! वो बेचारी तो हम सब के लिए अपनी जान खपती रहती थीं पूरे साल . तो यही वो समय होता था जब उन्हें थोड़ा समय मिलता था खुद अपने लिए , लेकिन माँ यह फरमान सुना देतीं थीं कि पहले स्कूल से मिला काम निपटाओ फिर बात करना .आजकल के बच्चों की तरह बहस करने अथवा ज़िद करने की हिम्मत नहीं थी हमारी .भूल से कभी कह भी देते  कुछ तो मुकदमा बाबूजी की अदालत में पहुँच जाता था और फिर तो जान बख्शी की कोई सूरत ही नहीं होती थी . बस लग जाते थे काम निपटने में कम से कम दस दिन लग जाते थे अवकाश कार्य पूरा करने में. खैर दस-बारह दिन बाद हमे. जाने की अनुमति मिल जाती थी ….

माँ के फोन करने की देर होती थी की  मामाजी लेने आ जाते थे .बस फिर क्या था,  पहुँच जाते थे नानी के यहाँ .तब तक किसी भी मामा के बच्चे तो थे नहीं. हाँ मौसी की दो बेटियां थीं वे दोनों हमसे लगभग सात आठ साल छोटी थीं.अभी स्कूल नहीं जाती थीं तो उनकी ज़िम्मेदारी हमारे नन्हे कन्धों पर आ जाती थीं खैर हम उन्हें प्रेम बहुत करते थे ….वहां हमारा दिन आरम्भ होता था सुबह की सैर से . नानी के मोहल्ले के सब बच्चे और छुट्टियों में इधर-उधर से आने वाले बच्चे हमारे साथी थे ….

हमारे नाना – नानी उस समय के अच्छे खासे रईसों की गिनती में आते थे ,बहुत बड़ा घर था,आस पड़ोस में केवल दो घर थे जिनमें टेलीविज़न हुआ करता था उनमें से एक हमारा यानि की नानी का घर था …तो हर शनिवार और रविवार को मोहल्ले भर के बच्चे हमारे घर आया करते थे टी वि देखने .उन दिनों चौबीस घंटे वाले चैनल तो थे नहीं शाम को बच्चो के लिए कहानी आदि दिखाई जाती थीं या फिर समाचार हाँ सप्ताह में एक फिल्म ज़रूर आती थीं वो भी दो किश्तों में आधी शनिवार को और शेष आधी रविवार को …नानी कभी किसी को मन नहीं करतीं थीं टी व् देखने के लिए हालाँकि सबके जाने के बाद सफाई भी करनी पड़ती थी ….लेकिन हम सब बच्चे सोते थे एकसाथ हॉल में .ज़मीन पर बिस्तर बिछा दिए जाते थे और हम सात बच्चे भरपूर मटरगश्ती करते थे देर रात तक ….ननिहाल में एक बात बड़े मज़े की थीं की कोई कभी डांटता – डपटता नहीं था.

रात को सोते देर से ज़रूर थे लेकिन सुबह पांच बजे उठ जाते थे संगी -साथी आँख खुलते ही बुलाने आ जाते थे हम उठते और चुपचाप डातून कुल्ला करके मुँह धोये बिना ही घर से दबे पाँव निकल जाते थे यह रोज़ का नियम था ,घर में सबको पता था .इसलिए बता के जाना ज़रूरी नहीं था बस घर से निकल कर सीधे सड़क पर करते और बाउंटी के रास्ते पे घूमने चल पड़ता हमारा कारवां .लगभग आठ-दस की टोली थी उधम मचाते, भागते ,दौड़ लगते और पहुँच जाते वहां जहाँ प्रातः कालीन सैर और व्यायाम करने वालों का मेला सा लगा होता . दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास थी यह बाउंटी और आज भी है ..इतनी ख़ूबसूरत हरी -भरी जगह की बस मन रम जाये किसी का भी | खूब खेलते व्यायाम भी करते सबको देख -देख कर .जब थक जाते और भूख लगने लगती तब आती घर की याद ,तब तक नौ बज चुके होते थे घर पहुँचते तब तक मामी-नानी नाश्ता बनाने में लगी होती थीं ,लेकिन एक बात थी -स्नान किये बिना कहने खाना  नहीं मिलता था हमें …नहा-धो कर नाश्ता करते थे और बस फिर तैयार धमा- चौकड़ी के लिए.

कभी -कभी नानी के साथ फल सब्ज़ी लेने  बाजार भी जाते ,अपनी पसंद के ढेरों फल खरीदने  कर  लाते. घर में एक बड़ा सा टब था, उसे पानी से भर दिया जाता था और  सारे  फल उसमे डाल दिए जाते थे , आम , लीची , आलूबुखारे , आड़ू ,ख़रबूज़े क्या- क्या नहीं भरा रहता था उस टब में . बस सारे दिन निकाल – निकाल कर खाते रहते ….जो मज़ा तब आता था फल  खाने में वो अब कभी नहीं आता .

नानी के  घर की छत ऐसी थी की वहां जितने घर थे सबकी एक ही छत थी समझिये ,यानि सारी की सारी छतें आपस में जुडी हुई थीं | दोपहर को बारह बजे के आस पास सब ब्च्चे छत पर इकट्ठे हो जाते थे और कभी गिट्टे खेलना , कभी घर- घर खेलना और कभी छोटी- छोटी बात पे झगड़ा करना हमारा रोज़ का काम था. वह नीम का  पुराना पेड़ , जो इतना बड़ा था  कि छत के काफी बड़े हिस्से पर उसकी शाखाएं फैली हुई थीं और उन दिनों वह निबौलियों से भरा होता था …..कितनी मीठी थीं उस नीम की निबौलियाँ ! हम कहते भी थे तोड़ तोड़ क्र और खेलते भी थे उनसे ! कागज़ के उन नकली नोटों. से हम निबौली नहीं उन निबौलियों से बने आम खरीदते थे और बेचते भी थे !  जूतों की पोलिश की खाली डिबिया का बनता था तराज़ू और बस सज जाती थी आम की दुकान  ! जब मौसी खाना खाने के लिए आवाज़ लगाती थीं तब हम नीचे जाते और खाना खाने के बाद हमे सो जाने का आदेश मिलता था नानी माँ से . धूप में खेलने की इजाज़त नहीं मिलती थी .

शाम का समय सबसे अच्छा समय होता था .जब हम सोकर उठते थे तो नानी मैंगो शेक या लस्सी बना के तैयार रखती थी. हम उसे पीने के बाद हर दिन मिलने वाली खर्ची का इंतज़ार करते थे.आज भी याद है जब नानीजी अपनी रेज़गारी वाली पोटली निकलती थीं तो हम सब  उन्हें  घेर कर बैठ जाते थे , फिर मिलती थीं हमें एक -एक चवन्नी . चवन्नी लेकर हम कूदते- फांदते घर से निकल जाते थे .फिर अगला पड़ाव होता था नाना जी की दुकान….मिठाई की बड़ी दुकान थीं उनकी….शाम के समय  मामाजी बैठते थे दुकान पर. हम वहां से अपनी पसंद की मिठाई लेते और फिर दौड़ लगाते मुंशी काका की दुकान तक,  चवन्नी से खट्टी -मीठी लाल इमली , बूरा में लिपटे रामलड्डू , रंग -बिरंगी मीठी सौंफ, और न जाने क्या क्या खरीदते !

फिर झूला- बाग में जाते थे, जहाँ  खूब  सारे  तरह- तरह के झूले लगे हुए थे  , झूलते ,खेलते मस्ती करते और साथ- साथ अपनी मौसी की बेटियों को भी बहलाते और खिलाते थे . ज़्यादा तंग करतीं तो धीरे से चुटकी भर के रुला देते थे और रोते हुए उन्हें घर छोड़ आते थे. बेचारी !

जब तक अँधेरा न हो जाता घर की याद किसे आती थीं ! रात हो जाती तब कहीं घर जाते थे हम और रात को कहना खाने के बाद फिर छत पे सोने जाते थे कभी -कभी सब प्लान बना के और सब ऊपर ही सोते थे तो एक जगह इकट्ठे होकर फिर मस्ती करते, किस्से कहानियां  सुनते थे . जब गहरी नींद आने लगती तब अपने – अपने बिस्तर पर सो जाते थे …..

जब छुट्टियां ख़त्म होने को आतीं तो अपने घर लौटना पड़ता था ! रुआंसे हो जाते थे हम , जाने का बिलकुल भी मन नहीं होता था , लेकिन विवशता होती थी स्कूल खुलने की सो , जाना ही पड़ता था . कई दिन तक उन यादों की खुमारी उतरती न थी …..फिर इंतज़ार रहता था अगली छुट्टियों का !

कितना प्यारा था हमारा बचपन !   आज  सोचती  हूँ  तो  कभी – कभी  मन  करता  है  कि काश  ! कोई टाइम- मशीन होती और हम फिर से बचपन में लौट पाते ! माँ-बाबूजी , नाना- नानी  सब वापस मिल जाते !

मंजु सिंह

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