विदेश में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भागीदारी का यह मेरा पहला अनुभव था-विस्मयकारी और अविस्मरणीय! एक मशहूर पत्रिका में छपी सूचना से मुझे इस सम्मेलन की जानकारी मिली, जिसमें उस वेबसाइट का उल्लेख था। उत्सुकतावश मैंने उस वेबसाइट से सारे विवरण प्राप्त किए और ऑनलाइन ही अपना आवेदन भेज रखा था। अचानक जब 24 जुलाई 2018 को मुझे विदेश मंत्रालय से एक मेल प्राप्त हुआ। इस संदेश के था कि मेरा चयन मॉरीषस के इस सम्मेलन के लिए सरकारी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में हुआ है, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और मेरे लिए यह एक स्वर्णिम अवसर प्रतीत हुआ। मुझे मॉरीशस की कोई जानकारी न थी। मात्र यह कि वहां के भारतीयों को हमारी संस्कृति के प्रति लगाव है और वहां के लोग भारतीय भाषायें और साथ ही फ्रेंच भी बोल लेते हैं। चूंकि पांडिचेरी भी ऐसा ही प्रदेश है, मेरे विचार में आया कि मॉरीशस दूसरा पांडिचेरी होगा।
भारतीयता से भरपूर ऐसे स्थल के दर्शनार्थ मेरे मन में कौतूहल उत्पन्न हुआ। आखिर वह दिन भी आ गया जब मैं मॉरीशस यात्रा के लिए दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय वायु अड्डा जा पहुंची। अकेले विदेष चलने की यह मेरी पहली यात्रा थी, अतः मन में अज्ञात किंतु अवांछित भय उत्पन्न हो रहा था। किंतु देर रात को जब मैंने अपने भावी सहयात्रियों और सम्मेलन के आयोजकों की स्फूर्ति और उत्सुकता देखी, तो मेरा यह भय गायब हो गया। एयरपोर्ट में मानो एक मेला लगा हुआ था। विष्व हिंदी सम्मेलन के अनेक फलक जहां-तहां लगे हुए थे और विदेष मंत्रालय के युवा कर्मचारी इस चिह्न वाले टी षर्ट पहन पूरी तल्लीनता से हम यात्रियों की पंजीकरण एवं जांच की मदद में जुटे हुए थे। मैंने पाया कि देष के विभिन्न प्रांतों के साहित्यकार वहां षामिल हैं। मैंने उनसे अपना परिचय खुद कराया ताकि पूरी यात्रा में मुझे अकेलापन न महसूस हो।
आगरा हिंदी संस्थान की विदेषी छात्राएं जिस तरह धाराप्रवाह हिंदी बोल रही थीं, इसे देख मुझे काफी अचरज हुआ। विष्व हिंदी सम्मेलन में ऐसी छात्राओं का प्रतिभागी बनना सर्वाचित था। हमारा हवाई जहाज एक बृहत् विमान था जिसमें 250 यात्रियों की सीटें थीं। सरकारी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के अलावा सभी आयोजक, कैमरामेन, पत्रकार, कार्यकर्ताओं को भी इसी में जाना था। जब रात के एक बजे यह विमान अपना उड़ान भरा, साथ ही मानो मेरे अरमानों के पंख भी लग गए! रातभर विमान सेवक कुछ न कुछ खिलाते-पिलाते रहे और पांच घंटों का लंबा सफर कैसे गुज़रा-यह मालूम ही नहीं पड़ा। प्रातःकाल होते ही हम सही-सलामत मॉरीषस जा पहुंचे और एयरपोर्ट में मौजूद मॉरीषस कर्मचारियों की सहायता से अनेक बसों द्वारा अपने निर्धारित होटल जा पहुंचे।
तथापि मॉरीषस के प्रति मेरी उत्सुकता बढ़ी और वहां पहुंचते ही मुझे ज्ञात हुआ कि यह पूर्वी अफ्रीका का एक द्वीप है और भारत से अपनी दूरी के बावजूद इसकी आबादी के अनेक ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं जो इसे भारत के करीब लाता है, विशेषतः, इसकी 40 प्रतिषत आबादी भारत के प्रवासियों के वंषज हैं। मॉरीषस की खोज सोलहवीं षताब्दी में हुई और इस पर डच, फ्रेंच और अंग्रेजी षासन 1968 तक चलता रहा और अंत में यह देष स्वतंत्र हुआ। पर भारत में अंग्रेजी षासनकाल के दौरान कई भारतवासी मॉरीषस के गन्ने के खेतों में काम करने के लिए अनुबंधित कुली के रूप में बिहार, तमिलनाडु, आंध्र, महाराष्ट्र, उडीसा जैसे अनेक प्रदेषों से अंग्रेजी ठेकेदारों द्वारा ले जाए गए। इन अंग्रेजी ठेकेदारों ने मासूम भारतवासियों को मॉरीषस, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सुरीनाम, त्रिनिडाड, टोबेगो और फीजी आदि देषों में पत्थरों के नीचे भारी मात्रा में सोना पाए जाने के झूठ से बहकाया, फुसलाया और गिरमिटिया मजदूर (संइवनतमते वद ंहतममउमदज) बनाकर जहाजों से ले गए। इनसे कठिन परिश्रम करवाया और पहाड़ी प्रदेषों को समतल बनाकर गन्ने की खेती करने लगे। ं ंहतममउमदज -यह अंग्रेजी षब्द बोलचाल की हिंदी में किसी तरह गिरमिटिया बन गया और ये कुली गिरमिटिया कहलाने लगे। वास्तव में उन पथरीली पहाड़ी प्रदेषों को खेती योग्य बनाने के लिए इन मजदूरों को कमरतोड़ परिश्रम करना पड़ा। आज वहां जहां भी गन्ने के खेत लहलहाते हैं। वहीं लगता है उनकी खून-पसीने की गाथाएं वे मानो रो-रोकर सुना रहे हों।

इन भारतीय श्रमिकों के पास दो ही प्रमुख साधन थे-उनकी भाषा और संस्कृति एवं रामचरितमानस तथा अद्भुत जिजीविषा षक्ति! नितांत असहाय और संसाधनहीन मजदूरों ने षरीर के दुख भले ही उठाए, पर आत्मा पर खरोंच न आने दी। घर के आंगन में झंडे गाड़कर ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ के जाप से उन्होंने अपने दुख का सारा हलाहल चुपचाप पी लिया। रामचरितमानस और हनुमानचालीसा उनके रक्षा कवच बन गए। उनके श्रम का उत्पाद गन्ना जितना मीठा था, उनका जीवन उतना ही कड़वा और तीखा था। किंतु रामचरितमानस से उन्हें स्वाभिमानपूर्वक जीने की प्रेरणा मिलती थी। उसके नैतिक मूल्यों से जीने का बल प्राप्त होता था। इस ग्रंथ को पढ़ने के लिए वे हिंदी सीखते थे। इसे अपने संग न ले गए होते तो वे अपनी मातृभाषा और संस्कृति से वंचित रह जाते। वहां त्यौहारों, उत्सवों और मृत्यु पर भी रामायण पाठ की परंपरा है। यहां तक कि मॉरीषस के संसद में विधेयक पास कर रामायण केंद्र की स्थापना भी की गई है।
हवाई अड्डे से होटल तक की 70 कि.मी. की दूरी के लंबे सफर में हमने सड़क के दोनों ओर हरे-भरे लहलहाते गन्नां के खेत देखे। बीचों-बीच उन पत्थरों के ढेरों को भी आज तक यादगार के रूप में सुरक्षित रखा हुआ है, जिन्हें उन मजदूरों ने कठिन परिश्रम कर खोद निकाला था। षायद इन्हीं पत्थरों के नीचे सोना दबे होने की बात कहकर हमारे देष के लोगों को बहकाया गया।
मॉरीषस एक ऐसा सुंदर स्थल है, जहां विष्व भर से अनेक लोग अपनी छुट्टियां बिताने आते हैं। जिस होटल में हमें ठहराया गया, उसके चारों तरफ भी हरे-भरे और अनोखे पेड़-पौधे थे। समुद्र के तट पर बसे उस होटल के आगंतुक साफ, नीले और निष्चल समुद्र जल का आनंद उठा रहे थे। यह सम्मेलन विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन सभागार में आयोजित था। सम्मेलन के सूचना पट्ट और मॉरीषस तथा भारत के ध्वज सभागार के रास्ते को सुषोभित कर रहे थे। इस साज-सज्जा से मोहित होकर हमने काफी तस्वीरें खींचीं। यही नहीं, प्रवेष द्वार के दोनों ओर साड़ी में सुसज्जित मॉरीषस की महिलाएं बड़े स्नेह और आदर भाव से हमें हिंदी में स्वागत कर रहीं थीं। मानो ‘वैष्विक हिंदी और भारतीय संस्कृति’ -सम्मेलन के इस विषय की अहम भूमिका वे खुद अक्षरशः निभा रही थीं।
मॉरीषस के प्रधानमंत्री श्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ द्वारा सम्मेलन के उद्घाटन के बाद हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के अचानक निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि समर्पित की गई। अनेक मनोरंजन कार्यक्रम भी रद्द कर दिए गए। अनेक समानांतर सत्र संचालित हुए और हमें प्रवासी संसार-भाषा और संस्कृति सत्र अत्यंत प्रभावषाली प्रतीत हुआ। समापन समारोह के दिन अनेक विद्वान और समाज सेवी पुरस्कृत हुए। सभागार के परिसर में ंभारत और मॉरीषस सरकार की अनेक संस्थानों ने प्रदर्षिनी लगाई हुई थी।
स्थानीय पर्यटन कार्यक्रम के दौरान हमें गंगा तलाव में गंगा आरती के लिए ले जाया गया। यहां के भारतीय निवासी मुख्यतः बिहारी अपनी मूल संस्कृति को बनाए रखे हुए हैं और यहां गंगा आरती करते हैं जैसे उनके पूर्वज भारत में करते थे। हम अप्रवासी घाट भी गए जो पोर्ट लूइस में स्थित है। यह एक इमिग्रेषन डिपो है जहां भारत से जहाज में आने वाले मजदूर उतारे जाते थे। उनके हाथों या पैरों में लोहे की पट्टी बांध दी जाती थी ताकि वे बिना अनुमति उस देष से बच निकलने का प्रयास न कर सकें। इन पटि््टयों में उनकी मजदूर संख्या, नाम आदि गढ़े होते थे। इस भवन का निर्माण 1849 से 1943 तक हुआ। पूरे ब्रिटीष साम्राज्य में काम करने के लिए पांच लाख मजदूर इस अप्रवासी घाट से होकर गुजरे।
हम महात्मा गांधी संस्थान भी गए जिसके पांच संकाय हैं। इसका उद्घाटन 1973 में दोनों देषों के प्रधानमंत्रियों द्वारा किया गया। यहां हमने भारतीय भाषा अध्ययन, भारतीय विद्या संकाय, संगीत एवं नृत्य कला संकाय, ललित कला संकाय, मॉरीषस एवं क्षेत्रीय अध्ययन संकाय के दर्षन किए, जिसमें पाणिनि भाषा प्रयोगषाला, रिकॉर्डिंग स्टूडियो, भारतीय अप्रवासी अभिलेखागार, लोक संग्रहालय, गिरमिटिया मजदूरों के ऐतिहासिक दस्तावेजों, षिल्पकृतियों, चित्रावलियों एवं वस्त्राभूषणों की स्थाई प्रदर्षनी, कला गैलरी, सुब्रमण्यम भारती लेक्चर हॉल, दमुद्रणालय, प्रेक्षागृह आदि के भी दर्षन किए।
तत्पष्चात् हम विष्व हिंदी सचिवालय भी गए। मॉरीषस में ही इन सचिवालयों का मुख्यालय है और इसका प्रमुख उद्धेष्य संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति की मांग है। वर्ष 2017 की गणना के अनुसार सारे संसार में करीब 40 करोड़ लोग हिंदी भाषी हैं। वर्ष 2015 में भारत के प्र्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने इस भवन की नींव के पत्थर की स्थापना की।
मॉरीषस की भाषा क्रियोल है जो अधिकांष लोगों से बोली जाती है। यह अनेक भाषाओं के सम्मिश्रण से बनाई गई एक भाषा है। इसके अतिरिक्त यहां फ्रेंच, अंग्रेजी, तमिल, हिंदी, मराठी, उर्दू और भोजपुरी भी बोली जाती है।
हमें जो भोजन परोसा गया, उसमें विषिष्ट रूप से हमें दाल पूरी पसंद आई। हमारे यहां की पूरन पोली का ही यह एक नमकीन रूप है। वहां प्रायः चाय बिना दूध के ही पीते हैं। अतः जब हम दूध मांगते तो हमें ठंडा दूध ही मिलता जिससे हमारी चाय ठंडी हो जाती।
पुस्तकालय के लिए मैंने अपनी पुस्तकें भी भेंट कीं। हमें इस बात पर बेहद खुषी हुई कि मॉरीषस स्वयं को भारत माता का पुत्र मानता है और संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को राजभाषा बनाने के भारत के प्रस्ताव का वह पूरा समर्थन करेगा।
अंतिम दिन के समापन समारोह की अध्यक्षता पष्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केषरीनाथ त्रिपाठी ने की। इसमें सत्रों के संयोजकों द्वारा सत्रों की अनुषंसाओं की प्रस्तुति हुई। तदुपरांत भारतीय और विदेषी हिंदी विद्वानों एवं हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ी भारतीय और विदेषी संस्थाओं को भी विष्व हिंदी सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त विष्व हिंदी सम्मेलन और विष्व हिंदी सचिवालया के ‘लोगो’ की संरचना के लिए दो कलाकारों को पुरस्कृत किया गया। सम्मेलन स्थल पर अभिमन्यु अनंत, गोपालदास नीरज, भानुमति नागदान तथा सूरजप्रसाद मंगर‘भगत’ जैसे हिंदी सेवियों के नाम पर मुख्य सभागार एवं समानांतर सत्रों के कक्षों के नाम रखे गए। इसके अलावा मणिलाल डॉक्टर, राय कृष्णदास, महावीर प्रसाद द्विवेदी, पंडित नरदेव वेदालंकार तथा विक्रम सिंह रामलाला जैसे विद्वानों के नाम पर भी सम्मेलन के कक्षों/स्थानों के नाम रखे गए। सम्मेलन के दौरान भारत और मॉरीषस के अनेक प्रकाषकों/संस्थाओं द्वारा पुस्तक प्रदर्षिनी लगाई गई जो मुख्य रूप से हिंदी साहित्य, हिंदी प्रौद्योगिकी एवं प्रकाषन से संबंधित थे। हमें बहुत अचरज हुआ जब स्थानीय लोगों ने हमारे लिए भोजपुरी वेष-भूषा में भोजपुरी गाने और नृत्य, तबला और हारमोनियम के संगत में प्रस्तुत किए।
मॉरीषस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने समापन समारोह के दौरान अपने भाषण में कहा कि इस सम्मेलन ने भारत और मॉरीषस के बीच के खूनी रिष्ते को और भी प्रगाढ़ बना दिया है। हम भारतमाता कहते हैं तो हम उनके पुत्र बन जाते हैं। पुत्र अपना कर्तव्य निभाएगा और संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को राजभाषा की मान्यता के लिए अपना समर्थन देगा। हिंदी ने उस देष की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रगति के लिए काफी सहायता की है। अनेक प्रसिद्ध विद्वानों से मुलाकात, उनसे विचार-विमर्ष, अनेक विदेषी विद्वानों का परिचय और साहित्यिक परिचर्चा जैसे अनेक विषयों पर लाभान्वित होने पर मेरे लिए यह सम्मेलन काफी सार्थक और सफल सिद्ध हुआं। अंत में हमें जो स्मृति चिन्ह सहित अनेक पुस्तकें दी गई थीं। इनके साथ-साथ हम अनेक सुंदर स्मृतियों से भरपूर हो वापस भारत लौट आए। निष्चय ही मेरे लिए यह सम्मेलन की या़त्रा चिरस्मरणीय रहेगी।
डॉ.जमुना कृष्णराज

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