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भाग्य की गति …..एक मेहमान

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सपना पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था । आज 5 दिन से बेटा दिव्य  अस्पताल में था । एक्सीडेंट के कारण बुरी तरह घायल हुआ था । आँखों की रौशनी जाती रही ।आज सदमे के कारण बहू को भी  समय से पहले लेबर पैन शुरू हो गया ।उसे भी सपना नर्सिंग होम  ले कर गयी ।

 सपना नर्सिंग होम में  बैठी थी। अंदर बहू का ऑपरेशन चल रहा था ।
ऑपरेशन खत्म हुआ ।डॉ ने सपना  से कहा -”-मां जी ! धैर्य रखिये  ,बच्चे के दिल में  छेद था  ,हम उसे बचा नहीं पाए !”
सपना को समझ नहीं आ रहा था कि ईश्वर उसके साथ क्या खेल “खेल ” रहा है ?
तुरन्त उसने एक निर्णय लिया ।
डॉ से बोली -क्या बच्चे की आँखे ठीक थीं ?
हाँ ।
क्या उन्हें दान लिया जा सकता है ?
हाँ कुछ घण्टे के भीतर उनका उपयोग किया जा सकता है ..डॉ  ने कहा ।
सपना ने  सारी कार्यवाही पूरी की , साराप्रबंध  किया गया ।बच्चे की  आँखें निकालने का  सफलता पूर्वक आप्रेशन हुआ ।आँखे दिव्य को प्रत्यारोपित की गयी  । अभी दिव्य बेहोश था ।बहु को सपना ने सब बता दिया था ।उसकी आँखों के आंसू जैसे थम गये थे ।बिलकुल शून्य के समान वो  जड़ थी ।सपना सोच रही थी जब दिव्य को होश आएगा तो वो क्या सोचेगा ?

स्वयं सपना  ये महसूस कर रही थी …एक …”मेहमान””    आया था कुछ पल के लिए जो उसके बेटे और अपने पिता को  नए जीवन  का वरदान दे गया ।शायद यह “मेहमान “ इसी उद्देश्य से उनके घर आया था ।यही भाग्य की गति थी !
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डॉ संगीता गांधी

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