वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे

 

वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे।

गुलशन का कोना-कोना ही सहरा दिखाई दे।।

हद्द हो चली है जेहद ए मुसलसल की काविशे।

क्या  बात  है न कोई ,जजीरा  दिखाई दे।।

ले चल बुलंदियों की तरफ़ मुझको ऐ जुनूँ।

इंसान का जहां से अब ,साया दिखाई दे।

चेहरे बहुत से मिलतें हैं ,उस भीड़ में मगर।

लगता है ऐसा हर कोई,तन्हा दिखाई  दे।।

‘मजबूर’ उस नसीब पर रोया किये  सदा।

दरिया के पास रहके जो प्यासा दिखाई दे।।

-डॉ मनोज कुमार सिंह

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