खन्डहर

सदियो की गाथा समेटे,
उनका दुख कोई न मेटे।
खड़े है,बिरान खन्डहर अकेले।
युग युग का दुख झेले ,
मिट्टी के ए खन्डहर ,अब भी रोते है।
बिछड़न से अपनो के दर्द मे सोते है,
निहरती है ऑखे उनको ,
पड़े है पद्चिन्ह जिनके।
कब से देख रहे?
प्यासे नयन निहार रहे।
सर्द भरी ऑधियो मे।
दर्द भरे झोंको मे।
बारिश की मार खायी,
धूप मे गर्मी पायी।
दृष्टि डाले मार्ग मे तेरे,
हैरान से देखते नयन चितेरे।

-मनीषा यादव

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