भिखारिन

फ़टी साड़ी और एक गठरी लेकर
कभी अकेले कभी दूकेले
वो आती है , हाथ फैलाती है
कभी लड़की की शादी ,
कभी कोई चढ़ावा
कभी बीमारी तो
कभी सच या छलावा
हमें बताती है।

हमारे घर के द्वार से ही
हमारे ह्रदय का द्वार खटखटाती है,

चन्द शब्दों मात्र से
हमें झकझोर जाती है
हमारे मानस पटल पर
एक करुण चित्र उकेर जाती है
और हमसे हमारी दया की हैसियत लेकर चली जाती है

फिर किसी और रूप में
फिर किसी और रोज
वो आती है , हाथ फैलाती है
बहाने बताती है , द्वार खटखटाती है,
और झकझोर कर हमारे अंतर्मन को
एक द्रवित चित्र उकेर जाती है
प्रतिक्रियायें दुहराती हैं
वो भिखारन आती है , वो अक्सर ही आती है।

— सुमित कुमार सोनी

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