मोल चुका जाना प्रिये तुम

मोल चुका जाना प्रिये तुम, अनब्याही उन रातों का
उन दंशो का, उपदंशों का, उन घातों का प्रतिघातों का
मोल चुका जाना प्रिये तुम

सुप्त धरा सा जीवन मेरा, बीज नेह का तुमने बोया
अब अंकेक्षण क्यों करना, क्या पाया और क्या है खोया
अलग हो चुकी राहो का, क्षत विक्षत इन आहो का
जीवन पथ के बहीखातों का, जुड़ न सके उन नातों का
मोल चुका जाना प्रिये तुम

सप्त जन्म की सौगंधें थी , पर अलग अलग अपनी राहें थी
अलग अलग अपने सपने थे, अलग अलग अपनी बाहें थी
अवांछित सौगातो का, अनचाही मुलाकातो का
मोल चुका जाना प्रिये तुम

शून्य रहा है अपना जीवन, मैला हुआ आभासी दर्पण
क्यूं कर पाले कामनाओ को, चलो कर ही दे इनका तर्पण
राह मे बिखरे पातों का, अनकही सब बातो का
मोल चुका जाना प्रिये तुम

— अभय

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu