याद का कोना

सांझ की ढलती धूप,
कितनी यादों का कोना समेटे?
खामोश चली गयी ओढ़ सिलवटे।
खन्डहर की मिट्टी मे,
किसकी यादों के विछौने,
पर पड़ी शुन्य निशा सी ।
झांक रही मन के कोने मे।
कल की पुरवाई सी बीत गयी।
कहाॅ बसन्त मेरे उनके आवन की।?
हाथो से फिसल रहा ऑचल अपना।
साथ चलती परछाई सा।
रोशनी के स्पर्श से लिपटा जुगूनु जा समझ अपना।
मन के दिप कहां जा कर लगे जलने।?
खन्ड खन्ड सी हो चली ।
मन के झंकार कहां जा कर लगे बजने।?
गिरती उठती लहरो सी दूषित।
अब जीवन की सुबह,
किसके याद सी बहती स्वच्छ सरित।?
भीतर ही भीतर बिखरे बिस्तर की,
मिटती मुस्कान मे खोकर।
हर्षित सा फूल रहा।
शुन्य नभ सा जीवन मेरा।
वैभव की बसन्त कब से ढुढ़ रहा?

-सरिता यादव

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu