बचपन, मानव जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण चरण है. औपचारिक शिक्षा और संस्कारों के माध्यम से बच्चों को देश, काल व परिस्थिति से अवगत कराते हुए इसी चरण में उन्हें एक सुरक्षित भविष्य की ओर अग्रसर किया जाता है. लेकिन, अच्छी शिक्षा और संस्कारों का मिलना उन करोड़ों बच्चों के लिए आज भी एक सपना है जिनका बचपन बालश्रम की भेंट चढ़कर उन्हें अमानवीय परिस्थतियों में काम करने को मजबूर कर रहा है. यूनिसेफ की परिभाषानुसार बालश्रम वह कार्य है जो किसी बच्चे के लिए हानिकारक है और न्यूनतम तय किए गए घंटों की संख्या से ज्यादा है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन बालश्रम को बच्चे के स्वास्थ्य की क्षमता, उसके शिक्षा को बाधित करने और उसके शोषण के रूप में परिभाषित करता है. सामान्य रूप से बालश्रम को बालकों द्वारा किए गए ऐसे कार्यों के रूप में निरूपित किया जाता है जो उनके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता को प्रभावित कर व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास को प्रभावित करते हैं. भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की परिभाषा के अनुसार, कोई भी 14 वर्ष से कम आयु का बच्चा जो मजदूरी करता है, बाल श्रमिक की श्रेणी में आता है.

बालश्रम के इतिहास को टटोलें तो इसकी जड़ें औद्योगीकरण से जुड़ी दिखाई देती हैं, हालाँकि गहराई में जाकर अध्ययन करने से सामने आया कि यह जघन्य और शर्मनाक कार्य औद्योगीकरण के बहुत पहले से चला आ रहा है. 1780 और 1840 के दशक के दौरान बाल शोषण में भारी वृद्धि हुई थी. 1788 में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कपड़ा मिलों में श्रमिकों में 60% से अधिक बच्चे थे. औद्योगीकरण के बाद से कारखानों, खदानों में, जूता पॉलिश के लिए, घरेलू कामों के लिए नौकर के रूप में, रेस्तराँ में वेटर के रूप में, चाय की दुकान आदि पर बच्चों का काम करते देखा जाना आम हो गया. आज 21वीं सदी में हम ऐसे समय में खड़े हैं जब बालश्रम अपने सबसे विकृत रूप में हम सबके सामने है, जिसके तहत संगठित भीख मंगवाना, बच्चों का यौन शोषण, वेश्यावृत्ति एवं पोर्नोग्राफी में बच्चों का उत्पीड़न और मादक पदार्थों की तस्करी के लिए बच्चों का उपयोग किया जाना शामिल है. इस समस्या की गम्भीरता से विचार करते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने बाल श्रम को कानूनन अपराध का दर्जा संविधान में मौलिक अधिकार के अंतर्गत शोषण के विरूद्ध अधिकार शीर्षक से अनुच्छेद 23, 24 में प्रावधानित कर दिया. लेकिन आज भी भारत में कुल 25 करोड़ 96 लाख 40 हजार बच्चों में करीब 4 करोड़ 30 लाख 50 हजार बाल श्रमिक हैं. बाल श्रमिकों में सबसे भयावह स्थिति बालिकाओं की है. क्योंकि इनके बहुत से कार्य अदृश्य ही रहते है. बड़ी संख्या में लड़कियां ही घरेलू कामगार के रूप में नियोजित की जाती हैं, जहां उन्हें सभी प्रकार के शारीरिक श्रम कार्य जैसे घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन साफ करना, कपड़े धुलना आदि आदि कार्य करने पड़ते हैं. और बालिकाएं शिक्षा से वंचित रह जाती हैं और उन्हें उनके सेवा श्रम का कोई श्रेय भी नहीं मिलता. बाल श्रम के अंतर्गत बच्चों को माता-पिता के साथ वो काम भी करना जिनमें शारीरिक, मानसिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी गम्भीर रूग्णता होने की संभावना बनी रहती है. यथा सिन्दुर, कांच, चुड़ी, बीड़ी, स्वर्ण जेवहारात इत्यादि उद्योग .

जिन बच्चों के माता पिता अन्य घर में जाकर काम करते हैं उन घरों के कुछ काम में बच्चों को हाथ बंटाना पड़ता है. चाय की दुकानों, सडक़ किनारे ढाबों, भोजनालयों, होटलों, मनोरंजन केंद्रों आदि में काम पर बच्चों को रखना आसान है ,यही नहीं भवन निर्माण स्थलों, खानों और यहां तक की उद्योगों में भी बच्चों को काम पर रखना आम बात हो गई है. समस्त परिप्रेक्ष्य का अवलोकन करें तो बाल श्रम के लिए आर्थिक और सामाजिक समस्या एक समान जिम्मेदार हैं. फ़िर भी इसके लिए सबसे बड़ा कारक निरक्षरता भी है क्योंकि सुशिक्षित परिवार के बच्चे बाल श्रम में दुर्लभता से संलिप्त मिलेंगे.   बाल मजदूरी की कुप्रथा को खत्म किया जा सकता है उसके लिए समुचित पारिश्रमिक, सर्वश्रेष्ठत स्वास्थ्य लाभ, परिस्थितिकीय नैतिकता, सर्वशुलभ सामाजिक समानता और श्रेष्ठ शिक्षा और जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है.

विकास तिवारी

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