सावन की बारिश

सावन के मौसम में अजीब कशिश रहती है,

सुलगता है दिल पर आँख में बारिश रहती है,

बेसबब उमड़ती हैं चाहतों की घटाए ज़हन में,

बेक़रारी दिल में खींचती इक खलिश रहती है,

बेबाक होकर गरजते हैं स्याह बादल सीने में,

कौंधी हो बिजली जैसे, ऐसी लरज़िश रहती है,

सोच की परवाज़ बेशक तेज़ हवाओं में रहे,

घर में क़ैद हम, बरसात की बंदिश रहती है,

दिलो-दिमाग पे असर मौसम की खुमारी का,

तूफां की ख्यालो-ख़्वाब पे जुम्बिश रहती है,

तन्हा खड़े तो है वीरान सूखे दरख़्त माफिक,

मगर साथ भीगने की कैसी ख़्वाइश रहती है,

‘दक्ष’ हर बरस यही आज़माइश रहती है,

बारिश के मौसम से कुछ रंजिश रहती है,

-विकास शर्मा ‘दक्ष’

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