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By |2017-05-17T08:08:24+00:00May 16th, 2017|Categories: दोहे/मुक्तक/शायरी|0 Comments

दशरथ सुत चलत भवन, चितवत सब मात।
कमल नयन अनुजहि जस,प्रमुदित जलजात।।
दिनकर प्रकट करहि अब, मनहि मन विचार।
उदित रवि कुल प्रभु सकल, अब नमन हजार।।

( २ )

कमल नयन दशरथ सुत, वह रविकुल वंश।
हरसत प्रभु अनुजहि सब, जस दिनकर अंश।।
मुनि प्रकट करहि गुन अब, हुलसत सब मात।
करतब लख दशरथ सुत, उर सुख न समात।।

— राकेश यादव “राज”

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