बिल्ली़

Home » बिल्ली़

बिल्ली़

By |2017-05-17T08:04:15+00:00May 16th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

बिल्ली,

बैठी रहती है

रात को

मेरे दरवाजे के

देहलीज पर

घात लगाए चूहे पर

एकांत मौन एकाग्र

अपनी भोजन की

तलाश में

एकनिष्ठ

मुझे भी

अपनी भोजन

की तलाश में

एकाग्र और एकनिष्ठ

हो जाना उचित लगता है।

संतोष कुमार वर्मा 

Say something
Rating: 3.7/5. From 3 votes. Show votes.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment

हिन्दी लेखक डॉट कॉम

सोशल मीडिया से जुड़ें ... 
close-link