गीता

गीता करती
बात योग की !
कर देती…..
उसको साकार |
योग-कर्म-ज्ञान
और भक्ति
सिखलाकर
देती आकार ||
समत्वयोग से
गीता हमको
समभाव बतलाती है |
मानस से
अतिमानस बनना !
ऐसी कला सिखाती है ||
निष्काम कर्म को
जहन में भरती !
सदा लोभ से
दूर ही रखती |
मन में ज्ञान का
“दीप” जलाकर
अन्तर्मन की
शुद्धि करती  ||

— डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”

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