गांव की याद

” दादा जी , प्लीज़ कुछ भी गांव के बारे में बताइए न ! कैसा होता है ? ”

” फार्म हाउस की तरह होता होगा शायद , मैंने अपने बुक्स में जो फोटो देखा तो वह तो गुड़गांव वाले फार्म हाउस जैसा ही लग रहा था ।ढेर सारे पेड़ , घास और बस ग्रीन ही ग्रीन ! ” दस साल का सचिन अपने दादा जी की ऊँगली खींच कर प्रश्नों के बौछार किए जा रहा था ।

” दादा जी प्लीज़ आप मुझे हेल्प कीजिए न ! मुझे हिंदी की मैम ने गांव पर कुछ लिखने का होमवर्क दिया है । ” सचिन चिंतित हो उठा था ।

छठ पूजा में चंद दिनों की छुट्टी में पहुंचे अपने पूरे परिवार को देखकर पापा – मम्मी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था । खासकर दोनों पोते और नाती , नातिन तो उनके जान थे ।

एक तरफ पोते के बाल सुलभ प्रश्न चित्त को सुकून दे रहे थे तो दूसरी तरफ़ इन प्रश्नों की गहराई कुछ सोचने पर मजबूर कर रही थी । पापा को सहसा सोंधी मिट्टी की खुशबू , गांव के गलियारे , खेत और वह बड़ा सा आँगन , माई की डांट , बाबूजी का समझाना सब याद आ रहे थे। घर के सामने का अगस्त का पेड़ , छत पर चढ़ी कद्दू और नेनुआ की लत्तरें , जिसमें अतीत की यादें उलझ गयीं थीं । ठीक वैसे ही जैसे ईया का पल्लू इन लत्तरों में कभी उलझ जाया करता था।

शायद पापा यही सोच रहे होंगे क्योंकि हमने बचपन से इन यादों की चादर को ओढ़ा था , अतीत और अपनेपन की गरमाहट को महसूस किया था । भले ही वह कुछ दिनों के सफ़र से ही क्यों न मिला हो। पर हमने गांव देखा था । पापा की नज़रों से गांव देखा था , ठेले पर बिकती लकठो की मीठी खुशबू को अपने नन्हीं मुट्ठियों में भरा था , बहुतों के कन्धों पर गलियारों में घूमा था , जिनके नाम याद नहीं ।

भोजपुर जिले के अपने कटेया गांव को देखा तो था । मगर हमारे बच्चे अब किस्से – कहानियों में शायद देखेंगे ।बीहिया से कटेया गांव की तीन किलोमीटर की दूरी जो अक्सर पैदल तय किए जाते थे अब बच्चे तीन मिनट की दूरी भी गाड़ी से करते हैं । क्योंकि उनकी यादों में कोई गांव नहीं है …… सिर्फ किस्सों में हैं ….. जिसे सचिन जैसे बच्चे अपने दादाजी से सुनने की ख्वाइश रखते हैं ….. या शायद सिर्फ अपने होमवर्क पूरी करने के लिए।

पर पापा के मुखमंडल पर खुद ब खुद अल्हड़ पलों की अप्रतिम आभा बिखेर गयी थी …..उनके गांव की याद !

 

-सारिका भूषण

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