कमरे के भीतर

कमरे के भीतर

सीलन से टपकती छत के
बीचोंबीच चरमराती हुई आवाज़
एक पुराने पँखे की थी
दरवाज़े और खिड़कियाँ दोनों बन्द थे
और खिड़कियों के खांचों पर
चढ़ाई गई थी काली पन्नी
ताकि अंदर चल रहे
किसी भी घटना का कुचक्र
बाहरी आंखों के लिए
तमाशा का प्रथम पहलू न बने
भले ही अंदर
बिक रहा हो नारीत्व
परत दर परत और
हावी हो रहा हो पुरुषत्व
प्रतिशत दर प्रतिशत
बिस्तर न होने की वजह से
फर्श के एक कोने में
उस नंगे बदन को रेता जा रहा हो
बहुत ही विस्तार से,
शरीर जो कांप कर थिर गया है
बह चुका होगा रक्त प्रत्येक अंग का
बराबरी से,
हाँ शायद अदा हो गए होंगे
उस घनी बाल वाली छाती के
चार सौ रुपये,
जिनको उसने उसके मुहँ पे
बड़ी बेहरमी से फेंक कर
फिर से कुचलने का
वादा किया होगा,
और इतना कुछ होने के बाद भी
एक कायर एक तुच्छ
पंक्ति में खड़ा है
सब फिर से दोहराने के लिए।
और वह जो अंदर पड़ी है
मूर्छित सी
सम्भाल रही है अपने वस्त्रों को
अपना पेटीकोट अपना ब्लाउज ,साड़ी
और भी बहुत कुछ।

— कबीरा

Comments

comments

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    3
    Shares

Leave A Comment