कलरव ध्वनियों ने गूँज उठाया

जगतजीव द्वंद बनाने का

हवन की खुशबू तेरी ओर से आई

मुझे अनुभव जगाने का

कहीं चावल, कहीं गुग्गुल, कहीं पुष्प

सब बिखरे हैं, तेरे विलाप में

कंर्दन की आवाज सुन

मेरी भावभंगिमाएं चीख पड़ी

 तू जा रही है… (विस्मयता)

आज ज्योत की आजमाइशें

तेरे मुखड़ेपे चमकीं

अँधरियाएँ तेल की बानगी में

वो दम लें सिसकीं

ज्जवलित पुष्प भी तेरी छटा में

वो सुगंध बिखेर सकीं

पल्लव जल भी तेरी अदा में

वो तर्पण मुस्करा सकीं

तू जा रही है, स्पंदनस्पृश को

 मातमतन्मयता दिखाकर

 तात्विकपरिभाषा को मुर्ख बनाकर

सूचीभेदशेष को अनहदनाद सुनाकर

तेरे जाने से

ब्रह्मांड जीव अब मनहर निनादित होगा

संपूर्ण जगत का सृजन होगा

तेरे कदम ने हमारे कदमों पर

मृतचित्त छाप छोड़ दिया

हे स्पृंदा, हे विलक्षणा, हे दुर्गावासिनी

तुमने तो हमें प्रतीक्षारत कर दिया… !

-सुरभी आनंद 

 

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