बेबसी

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बेबसी

By |2017-08-02T20:25:20+00:00July 19th, 2017|Categories: कहानी|Tags: |0 Comments

‘‘यार मुझे तो एक ही लगन है,चाहे कुछ भी हो जाये एक फिल्म जरुर बनाउॅंगा। लेकिन फिल्म कैसी होगी वो तो तुम जानते ही हो। षुरुआत होगीवही नरेष रोड से ‘‘उसके घर के सामने।’’ मेरा होगा हीरो का रोल और यह रोल इस तरह का होगा कि वह भी देखेगी कि मैं भी कुछ हॅूं। नरेष बिना रुके बोले जा रहा था,चाहे कोई सुन रहा हो या या नही। उसे इससे कोई मतलब नही कि चौराहे से गुजरते हेये ट्रक की आवाज में उसकी आवाज धीमी पड़ कर लोप हो गई है। कोई क्या करे? कितना सुने? यह कभी नही सोचा उसने। हर आदमी की अपनी इच्छा होती है कि उससे कोई कितनी बात करे? उसे इससे क्या कि सारे दोस्त उसकी हँसी उड़ाते हैं या बात सुनते हैं।
‘‘फिल्म की कहानी लिखनी षुरु कर दी है’’,एक दिन बता रहा था। यूँ ही बेकार की बाँतें,रोज वही सिलसिला,समझ में नही आता,कब समाप्त होंगी? मिलने की हर षाम एक ही विशय जिसकी केन्द्र बिन्दु उसकी ‘‘वह’’ होती। उसने कितना महत्व दिया था उसे,वह नही जानता था। लेकिन अब उसके दोस्त भी ऊब भरे षब्दां की मेहरबानी से जान गये थे कि वे उस गृ्रह के वासी है जहाँ हमेषा ‘‘उमस’’ का मौसम रहता है। रोज की कल्पनायों का गीलापन ,कुछ न कुछ करने की उसे भेंटता रहा। काष,वह उन कल्पनायों को छुटकारा दिला देता,कुछ भी तो नही कर पाया था,सिवाय रंग बिरंगी कल्पनायों के जाल बुनने के।
सन 1966 में चित्रा चौराहे पर खड़े होकर,हाई स्कूल पास किया षायद तीन बार में। फिर डाक्टर बनाने का अपने पिता का सपना उसने बड़ी मेहनत से पूरा नही होने दिया। सन 1972 में कक्षा बारह ‘‘उसी’’ की देन मानता हुआ,उसी के लिये पास किया था जैसे,बी0ए0 प्रथम वर्श पहुँचते-पहुँचते अपनी नजर में काफी ऊँचा हो गया गया था। इसी बीच उसकी वह किसी दूसरे की हो गई तो उसने अपने आप को देवदास बना लेना चाहा,वह देवदास भी नहीं बन सका। कल्पना की ऊँची उड़ान षायद सभी सीमायें पार कर चुकी थी।

कभी तो यह कहना भी कठिन लगता कि उसे वास्तव में क्या कुछ करना हे। यह निष्चित न कर पाया था वह, अपने आप में गमगीन,हमेषा किसी न किसी कल्पना के गले में हाथ डाले फीकी सी हँसी,फिर बड़ा ही संजीदा होकर मिलता हमेषा। वास्तव में बहुत ही उदास हो गया था, जब उसकी ‘‘वह’’ किसी दूसरे की हो गई थी। समय ने उसे थपकी दी और जीवन सामान्य होने का नकलीपन साफ दिखाई देता उसके चेहरे पर। सभी कभी मजाक में कभी गम्भीरता से बात करते कि वह आत्महत्या से न जा मिले? मेरे अन्दर बडी तीव्र वेदना होती,कुछ न कर सकने वाले भावों को देख कर। उसके साथ ऐसा कुछ नही हुआ परन्तु फीकी हँसी,औलियापन,गमगीन चेहरा षायद ईष्वर की देन लगने लगा था।
और जो भी हो उसने अपने जीवन के लिये,औरों की तरह रोटी पानी का बन्दोबस्त कर लिया था।‘‘आई0टी0आई0’’ का डिप्लोमा उसे इन्जीनियरिग के समान महत्व देता रहा। उसे तो हर हाल में खुष रहने की खब्त हो गई थी,षायद मजबूरी में,उसके मुँह से गालिब का षेर अक्सर सुनाई देता-‘‘इष्क ने निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के।’’
उसके चेहरे पर उसकी बेबसी का खुला चेहरा दिखाई देता क्योकि मजबूर सा दिखना तथा किसी से सहानुभूति प्राप्त करना उसके जीवन का लक्ष्य हो गया था।
उसके दोस्तों में एक सॉंवला बी0एस0सी0;प्रथम पास पटना का ललित था जो अपने में नमूना था,अपने में एक रहस्यमय अस्तित्व था। एक और मोटा सा दोस्त अखलेष अपने को ‘‘बुद्धिजीवी’’ जैसा जानवर कहता था जो कि अपनी परेषानियों से संघर्श करते हिम्मत न जुटा पाया था। थोड़ी बची हिम्मत के बल पर अपने को घिसटाता रहा था। एक और चष्मा पहने राजू अनेकां समाज की बेकार सी समस्यायों से उलझा,मन की भड़ास निकालता,प्रत्येक षाम को अपनी बेबसी पर रोता था। परन्तु हॅसमुख नाटक के नायक होने का रोल बड़ी बखूबी से निभाता रहा।
चारों की चौकड़ी में बातों का केन्द्र बिन्दु घूम फिर कर एक ही स्थान पर पहुँच जाता था-
एक का सब्जेक्ट ‘‘सुनीता’’ थी।
एक का सब्जेक्ट साहित्यकारों की कमी थी।
एक का सबजेक्ट सामाजिक समस्यायें थी।
एक का सबजेक्ट सबकी हाँ में हाँ मिलाना था।
और चारों की ‘‘मेन बात’’ रोज प्रत्येक की षादी के बारे पूछना था,‘‘षादी कब करवा रहे हो।’’
हाँ तो नरेष की फिल्म बन रही थी पिछले चार सालों से,‘‘ऐसी ट्रेजेडी होगी कि लोग देवदास को भूल जायेगे और हाँ सुनीता जरुर आयेगी! अपनी पिक्चर भी इसी चित्रा टाकीज में चलेगी लेकिन जब उसे टिकट नही मिलेगा तो मेरे पास आयेगी,़़़……….‘‘नरेष जी मुझे टिकट नही मिल रहा है।’’ और तब मैं कहूँगा,‘‘अभी लीजिये।’’ नरेष चित्रा के बगल में खड़ा बोले जा रहा था और उसके दोस्त उसकी बातों को जमुहाते हुये सुन रहे थे।
कितनी भी कल्पना हो ‘‘सुनीता’’ उसकी बाँतां की बुल होती। कितनी भी कल्पना मे उड़ा जाये साहित्य सृजन में कमी है,फलां ने लिखा हे,गलत हे,केन्द्र में चोट की जाती। भीड़ की कमी होती वरना अच्छा लीडर होता वह अखलेष,परन्तु मजबूरी में मेडिकल रिप्रेन्टेटिव (कल्पना में),पत्रकार होकर यष जो कमाना था उसे।
कैसी भी कल्पना होती पहले सेना,फिर पत्रकार,फिर चार्टड एकान्उटेन्ट,फिर कल्पना में जासूस होकर यर्थाथ में ‘‘बाबू’’ बन गया था उसका चष्मा पहने दोस्त राजू।
‘‘हाँ में हाँ वाला रहस्यमय दोस्त पता नही क्या कल्पना करता था,फिर भी वह रेल्वे में केजुअल लेबर हो गया था। हाँ उसकी रेल्वे में ड्राईवर बनने की बड़ी इच्छा थी जो अन्त तक बनी ही रही थी।
और नरेष भी क्या जो टेप रिकार्डर की तरह न बोले। उस षायद योग विद्या का पूरा ज्ञान था जो उसको बिना सांस लिये बोलने की प्रक्रिया को पूर्ण करने में सहयोग देता था। अपने बारे में कहता कि यार तुम्हें कौन सा डोज चाहिये,एक हफ्ते वाला,एक माह वाला,या छः माह का। बास्तव में उसकी वह डोज इतनी पावरफुल होती कि उससे एक हफ्ते या उससे अधिक मिलने की इच्छा का दम निकल जाता था। इतने पर भी उसे न छोड़ने की या मिलने की इच्छा हर रोज होती। उस समय तक उसमें इतनी हीनता आ गई कि उसकी कुंठाये उसे मारे दे रही थी।
आज भी न जाने कैसे दिख गया था अचानक,मिला हँसता हुआ,मगर फीकी हँसी,षायद कुछ न कर पाने की कुंठा थी। उसकी कुंठा ने उस पर बिना किराये दिये ही अपना अलाटमेन्ट करा लिया था। बोला,‘‘कहाँ हो,दिखाई नही दिये कई दिनों से?’’ चष्मे वाला दोस्त राजू न जाने क्या सोच कर बोला,‘‘वर्शों बीत गये झाँसी गये।’’ वर्शों बाद सारा षहर बदल गया लेकिन उसमें ‘‘जीरे’’ बराबर भी परिवर्तन नहीं पहुँचने पाया था, उससे पहले ही ड्रिलमेन्ट हो गया,बीबी के आने पर,एक हाथ में झोला,दूसरे हाथ में वही पुरानी ‘‘ऑस्टीन’’ (वकौल उसके) साईकिल पकड़े,बड़ा थका सा लगा।
‘‘कलकत्त्ता में हूँ,’’ं संक्षिप्त सा उत्तर दिया, और तुम क्या कर रहे हो अनमना हो पूछ बैठा,‘‘किसी कारण जल्दी में था,सोचा फुरसत में मिलूंगा।’’
‘‘कुछ नही यार,बस जिन्दगी की गाड़ी धकेले जा रहा हूँ।’’ निराषा का पक्षी उसके चेहरे पर बैठा उसे नोच रहा था। कुछ जवाव न देकर बोला,‘‘चलो,चाय पी जाय,,चलो चलते हैं।’’ ‘‘कहाँ,वहीं वर्कषाप में हो या कहीं और?’’ अपने को कछुये की गरदन सा समेटने की पूरी कोषिष करने में असफल होन पर बहुत धीमे षब्दों मे हॅा कहा।
मुझ उसकी सब बॉतों से प्रेम है बस सिर्फ हीन भावना के ,क्योकि वह उसके अन्दर स्थाई निवास के रुप में समा गई है,और उल्टा किराया वसूलने लगी है। मैनें बहुत कोषिष की,कि हीनता को निकाल बाहर करुँ परन्तु सबसे बड़ी हार इसी क्षेत्र में कमाई है मैंने अपनी जिन्दगी में।

-अजय कुमार दुबे,

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